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Chui Mui Plant : सीता माता के आंसुओं से हुआ छुईमुई का जन्म? जानिए शिव और अमृत से जुड़ी अद्भुत कथा

Chui Mui Plant Benefits : क्या आप जानते हैं पौराणिक कथाओं के अनुसार छुईमुई (लाजवंती) पौधे की उत्पत्ति सीता माता के आंसू से हुई थी। इसके वैज्ञानिक रहस्य, आयुर्वेदिक फायदे और पौराणिक मान्यताएं जानें। घाव भरने, बवासीर, मधुमेह और मानसिक शांति में इसके उपयोग के साथ जरूरी सावधानियां भी पढ़ें।

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भारत

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Manoj Vashisth

May 01, 2026

Chui Mui Plant Sita Tears Mythology

Chui Mui Plant Sita Tears Mythology : छूते ही सिकुड़ने वाला ये पौधा, क्या सच में सीता माता के आंसुओं से जन्मा था? (फोटो सोर्स: AI@Gemini)

Chui Mui Plant Sita Tears Mythology : छुईमुई के पौधे का नाम तो आपने सुना ही होगा लेकिन क्या आप इसकी उत्पत्ति की पौराणिक कथाओं के बारे में जानते हैं। ऐसा माना जाता है की इसकी उत्पत्ति रावण द्वारा हरण करने के बाद अशोक वाटिका में सीता माता के धरती पर गिरे आसुओं से हुई थी। समुद्र मंथन और भगवान शिव से भी इसका गहरा संबंघ बताया गया है। छुईमुई प्रकृति की गोद में एक ऐसा योद्धा है जो दिखने में तो इतना डरपोक है कि हवा के झोंके से भी शरमा जाए, लेकिन असल में उसके भीतर ऐसी शक्तियां छिपी हैं जो बड़े-बड़े घावों को भर सकती हैं और घर को नकारात्मकता से बचा सकती हैं। हम बात कर रहे हैं छुईमुई की, जिसे 'लाजवंती', 'संकोचनी' या 'नमस्कारी' भी कहा जाता है।

छुईमुई का अनोखा डिफेंस मैकेनिज्म

जैसे ही आप छुईमुई की पत्तियों को छूते हैं, वे तुरंत सिकुड़ जाती हैं। विज्ञान की भाषा में इसे 'थिग्मोनेस्टी' (Thigmonasty) कहते हैं।

इस पौधे के पत्तों के आधार पर पुलविनस नाम का एक हिस्सा होता है, जो पानी से भरा रहता है। स्पर्श होते ही एक सेकंड के भीतर पोटेशियम आयन और पानी कोशिकाओं से बाहर निकल जाते हैं, जिससे पत्तियां किसी फुसफुसाए गुब्बारे की तरह पिचक जाती हैं। यह कोई जादू नहीं, बल्कि कुदरत की बेजोड़ इंजीनियरिंग है, जो शाकाहारी जानवरों को भ्रमित करने के लिए विकसित हुई है।

छुईमुई का रहस्य: सीता माता के आंसू, शिव से जुड़ाव और विज्ञान का अनोखा मेल

सीता माता के आंसू: लोककथाओं के अनुसार, रावण द्वारा हरण के बाद अशोक वाटिका में माता सीता की आंखों से गिरे आंसुओं से इस पौधे का जन्म हुआ। इसीलिए इसमें लज्जा और पवित्रता का गुण समाया है।

अमृत की बूंदें: एक अन्य मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब मोहिनी रूप में भगवान विष्णु अमृत बांट रहे थे, तब उसकी कुछ बूंदें धरती पर गिरीं जिससे छुईमुई की उत्पत्ति हुई। यही कारण है कि आयुर्वेद इसे 'जीवन रक्षक' मानता है।

भगवान शिव और वैराग्य: सोमवार को शिवलिंग पर इसके फूल चढ़ाने का विशेष महत्व है, जो बाहरी दुनिया से विरक्ति और अंतर्मन में सिमटने का प्रतीक है।

आयुर्वेद का स्विस आर्मी नाइफ

आयुर्वेद में छुईमुई के पंचांग (जड़, तना, फूल, फल, पत्ती) का उपयोग होता है। इसकी तासीर शीतल होती है, जो पित्त और कफ को शांत करती है।

रक्तस्राव रोकना: इसके पत्तों का गाढ़ा लेप (बिना पानी मिलाए) लगाने से बहता खून तुरंत रुक जाता है। इसे वासो कॉन्सट्रिक्शन कहते हैं, जहां ऊतक सिकुड़कर घाव को सील कर देते हैं।

बवासीर और मधुमेह: इसके पत्तों का चूर्ण मट्ठे के साथ लेने से बवासीर में राहत मिलती है। वहीं, इसकी जड़ का पाउडर इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को सक्रिय करता है।

गठिया का दर्द: सरसों के तेल में इसकी जड़ और पत्तियों को जलाकर बनाया गया तेल जोड़ों की सूजन और जकड़न को जड़ से खत्म करने की क्षमता रखता है।

ऊर्जा और तंत्र विज्ञान का सुरक्षा कवच

तंत्र शास्त्र के अनुसार, छुईमुई केवल एक पौधा नहीं, बल्कि ऊर्जा का केंद्र है।

घर की सुरक्षा: अमावस्या के दिन मुख्य द्वार पर इसकी जड़ दबाने से घर में नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर पातीं।

मनोवैज्ञानिक शांति: इसकी जड़ का तिलक लगाने या ताबीज पहनने से अज्ञा चक्र शांत होता है, जिससे डर और बुरे सपने दूर होते हैं। इसे प्लेसबो इफेक्ट के साथ-साथ न्यूरोलॉजिकल शांति से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।

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