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मनुष्य, हठ के बिना ईश्वर दर्शन नहीं कर सकता : रामकृष्ण परमहंस

मनुष्य, हठ के बिना ईश्वर दर्शन नहीं कर सकता : रामकृष्ण परमहंस

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भोपाल

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Shyam Kishor

Jan 24, 2020

मनुष्य, हठ के बिना ईश्वर दर्शन नहीं कर सकता : रामकृष्ण परमहंस

मनुष्य, हठ के बिना ईश्वर दर्शन नहीं कर सकता : रामकृष्ण परमहंस

किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई। किसान नालियां काट-काटकर दूर से पानी लाते थे। एक किसान बडा़ हठी था। उसने एक दिन शपथ ली कि जब पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूंगा। इधर नहाने का समय हुआ। उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा। लड़की बोली, 'पिताजी, दोपहर हो गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है। 'उसने कहा, तू चल, हमें अभी काम है। दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर हटा रहा। नहाने का नाम न लिया।

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तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, 'नहाओगे कि नहीं? रोटियां ठण्डी हो रही हैं। तुम तो हर काम में हठ करते हो। काम कल करना या भोजन के बाद करना।' गालियां देता हुआ कुदाल उठाकर किसना स्त्री को मारने दौडा़ बोला, 'तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पडा़ है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएंगे? सब को भूखों मरना होगा। हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी।' मामला टेढा़ देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पडी़।

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किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया। फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर पानी खेत में 'कलकल' स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति और आनन्द से भर गया। घर पहुंचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, 'ले आ अब डोल और रस्सी।' स्नान भोजन करके निश्चिन्त करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा। जिद यह है और यही तीव्र वैराग्य की उपमा है।

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खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था। उसकी स्त्री जब गयी और बोली, 'धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते', तब वह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, 'अच्छा, तू कहती है तो चलो।' (सब हंसते हैं।) वह किसान खेत में पानी न ला सका। यह मन्द वैराग्य की उपमा है। हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वर दर्शन नहीं कर सकता।

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