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Garuda Purana: मृत्यु के बाद 10 दिन तक क्यों किया जाता है पिंडदान? जानिए आत्मा का रहस्यमयी सफर

Garuda Purana Niyam : मृत्यु एक ऐसा सत्य है जिससे कोई भी बच नहीं सकता, लेकिन इसके बाद क्या होता है, यह हमेशा से जिज्ञासा का विषय रहा है। सनातन परंपरा में इस रहस्य को समझने के लिए गरुड़ पुराण का विशेष महत्व माना जाता है।

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भारत

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MEGHA ROY

Apr 10, 2026

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गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा का रहस्यमयी सफर|Freepik

Garuda Purana: सनातन धर्म में जीवन और मृत्यु से जुड़े रहस्यों को समझने के लिए गरुड़ पुराण का विशेष महत्व माना गया है। इसमें बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है और उसे किन-किन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। खासतौर पर मृत्यु के बाद 10 दिनों तक पिंडदान करने की परंपरा के पीछे गहरा आध्यात्मिक कारण बताया गया है। मान्यता है कि इस दौरान आत्मा की यात्रा यमलोक की ओर होती है और पिंडदान से उसे शांति और सहारा मिलता है। आइए जानते हैं गरुड़ पुराण के अनुसार इस परंपरा का रहस्य और इसका महत्व।

आत्मा का शरीर से अलग होना

गरुड़ पुराण के अनुसार जब मनुष्य का अंत समय आता है, तब यमदूत उसके प्राण लेने आते हैं। कहा जाता है कि जो व्यक्ति मोह-माया में अधिक बंधा होता है, उसे मृत्यु के समय अधिक कष्ट झेलना पड़ता है। वहीं, जो व्यक्ति जीवन के सत्य को समझ चुका होता है, वह अपेक्षाकृत शांतिपूर्वक प्राण त्यागता है। मृत्यु के बाद शरीर से अंगूठे के आकार की जीवात्मा निकलती है, जिसे यमदूत अपने साथ ले जाते हैं।

यमलोक और आत्मा की वापसी

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यमलोक बहुत दूर स्थित है, जहां आत्मा को उसके कर्मों का पूरा हिसाब दिखाया जाता है। यह एक तरह से आत्मा के जीवन का मूल्यांकन होता है। इसके बाद आत्मा को पुनः उसके घर भेज दिया जाता है, जहां वह अपने शरीर में प्रवेश करने की कोशिश करती है, लेकिन सफल नहीं हो पाती। इस अवस्था में आत्मा भूख-प्यास और असहायता का अनुभव करती है।

10 दिनों तक पिंडदान का महत्व

यही वह समय होता है जब परिवारजन मृतक के लिए पिंडदान करते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, इन 10 दिनों तक किया गया पिंडदान आत्मा को ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आत्मा की सहायता का माध्यम माना जाता है। इन दिनों में दिए गए अन्न और जल से आत्मा को तृप्ति और आगे बढ़ने की ताकत मिलती है।

13वें दिन की यात्रा और कर्मों का फल

मान्यता है कि 13वें दिन आत्मा पुनः यमलोक की यात्रा करती है। इस बार वह पिंडदान से प्राप्त शक्ति के सहारे आगे बढ़ती है। वहां यमराज आत्मा के कर्मों के आधार पर निर्णय करते हैं स्वर्ग, नर्क या पितृलोक। इसके बाद आत्मा अपने कर्मों का फल भोगती है और फिर पुनर्जन्म का चक्र जारी रहता है, जब तक उसे मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता।