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जो सौम्य-सरल-सहज वही देवाधिदेव महादेव, जानिए कैसे करें उनकी पूजा

देवों में देव महादेव सर्वज्ञ सनातन होने के बाद भी सहज प्रसन्न होने वाले देव है। महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ को रिझाने का कोई अवसर नहीं गवाएं।

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Sunil Sharma

Feb 12, 2018

how to worship shiva

How to worship shivalinga mantra

अघोरेभ्योथघोरेभ्यो घोर-घोर तरेभ्य: सर्वेभ्यो सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेअस्तु रूद्ररूपेभ्य:।। (यजुर्वेद)

शिव पंचाक्षर ‘ॐ नम: शिवाय’ से गृहस्थ भी एकांत में ध्यान मुद्रा के साथ बैठकर ईष्ट सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी पर मंगलवार एवं उत्तराषाढ़ा नक्षत्र सिद्धि योग तथा मकर राशि का चंद्रमा आ रहा है। महाशिवरात्रि पर इस प्रकार पंचागीय संयोग बहुत कम बनते हैं। जब प्रदोषकाल से लेकर निशिथ (मध्यरात्रि) काल तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। शिव महापुराण के अनुसार 27 नक्षत्रों का अलग-अलग साधनाकाल का महत्त्व है। भगवान शिव ने स्वयं कहा है कि नक्षत्र के अधिपति के साथ मेरी साधना करने का विशेष फल होता है। महाशिवरात्रि सिद्धि साधना की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण मानी गई है। इस रात्रि में संकल्प की सिद्धि तथा मंत्र की सिद्धि एवं वनस्पति तंत्र के अनुसार देखें तो जीव औषधि या ब्रह्म औषधि सिद्धि करने वाली मानी गई है। यही नहीं यंत्र , मंत्र तंत्र इन तीनों क्षेत्रों को प्रबल बनाने वाली यह रात्रि शिव की कृपा से ओत-प्रोत रहती है यानी सब कुछ पाने का यह विशेष कल्प माना गया है।

यंत्र साधना
महाशिवरात्रि की रात संकल्प के अनुसार कोई काम करें तो वह अवश्य ही पूरा होता है। यदि जातक को धन की कमी है तो धन प्राप्ति के लिए विशेष साधना, ऐसे ही यश, ऐश्वर्य, विजय, कार्यसिद्धि एवं प्राप्ति तथा इच्छित सफलता आदि के लिए अलग-अलग यंत्रों का सिद्ध अनुक्रम सफलता देता है। इनमें विशेष रोग दोष की निवृत्ति के लिए महामृत्युंजय यंत्र, रूद्र यंत्र, पाशुपत यंत्र आदि वैदिक पद्धति से सिद्ध किया जा सकता है।

मंत्र साधना
देवों में देव महादेव सर्वज्ञ सनातन होने के बाद भी सहज प्रसन्न होने वाले देव है। महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ को रिझाने का कोई अवसर नहीं गवाएं। वैदिक गणना से देखें तो चारों वेद क्रमश: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के मंत्रों में लक्ष्य विशेष की सफलता के लिए अलग-अलग मंत्रों का विधान बताया गया है। शिव महापुराण में भी इन चारों वेदों के मंत्रों का कामना भेद से उल्लेख किया गया है। वैदिक तथा बीजोक्त दृष्टिकोण से कार्य की सिद्धि के लिए मंत्र विशेष का उल्लेख है। यदि पौराणिक मंत्रों को सही उच्चारण के साथ और संकल्प कर जपा जाए तो वे निश्चित सिद्ध होते हैं।

तंत्र साधना
तंत्र से आशय किसी कार्य को प्रणालीबद्ध तरीके से किया जाना है। बिना प्रणाली के कोई भी मंत्र, यंत्र को सिद्ध करने में सक्षम नहीं है इसलिए तंत्र शब्द का आविर्भाव हुआ। शिव महापुराण में तंत्र दो प्रकार के बताए गए हैं। पहला वैदिक, दूसरा अभिचार। यह प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में विशेष सहायक होता है। इसी में प्राणी के कल्याण का मार्ग निहित है। दूसरा प्रकृति के विरूद्ध मानते हैं जिसको पुराण पुरुष की अनुमति नहीं है।

अघोर है सौम्यता का प्रतीक
पौराणिक धर्मग्रंथ में अघोर शब्द को बहुत ही सुंदर तरीके से स्पष्ट किया गया है। यहां अघोर शब्द सौम्यता का प्रतीक बताया गया है। यजुर्वेद के अघोर मंत्र में शिव के पूर्ण स्वरूपों का यथार्थ प्रस्तुत हो रहा है। जो सौम्य है सरल है वह गंभीर भी है। जो आत्मतंत्र को एकाग्र कर सर्वशक्त है अर्थात शक्तिमान है। ऐसे रूद्र रूप को हम नमस्कार करते हैं। जो सर्वज्ञ सनातन होने के बाद भी सहज प्रसन्न होने वाले महादेव है।