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Jagannath Temple Doors Closed: स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिनों तक क्यों बंद रहते हैं जगन्नाथ मंदिर के कपाट? जानें अनासर परंपरा

Jagannath Anasara 2026: 108 पवित्र कलशों के महास्नान के बाद आखिर क्यों बंद कपाट के पीछे चले जाते हैं ब्रह्मांड के नायक? जानिए जगन्नाथ पुरी की उस रहस्यमयी परंपरा के बारे में, जहां भगवान को भी चढ़ता है बुखार और फिर शुरू होता है गुप्त इलाज का दौर। जानिए स्नान पूर्णिमा (Snana Purnima) के बाद भगवान जगन्नाथ के अनासर काल और उससे जुड़ी अद्भुत धार्मिक परंपरा।
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भारत

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Manoj Vashisth

Jun 30, 2026

Jagannath Snana Purnima

Jagannath Temple Doors Closed : भगवान जगन्नाथ को बुखार क्यों आता है (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Jagannath Snana Purnima: सनातन संस्कृति और लोक परंपराओं का एक ऐसा अद्भुत संगम, जहां भगवान और भक्त का रिश्ता बिल्कुल मानवीय हो जाता है! विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा से ठीक पहले, ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी में एक बार फिर इतिहास और आस्था का भव्य अध्याय दोहराया गया। महाप्रभु जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों के जल से दिव्य महाभिषेक (Snana Purnima) संपन्न हो चुका है। लेकिन इस शाही स्नान के तुरंत बाद, अगले 15 दिनों के लिए भक्तों के लिए प्रभु के दर्शन पूरी तरह बंद हो गए हैं। आखिर इसके पीछे की वजह क्या है और इन 15 दिनों में गर्भगृह के भीतर क्या होता है, आइए जानते हैं इस दिलचस्प परंपरा के पीछे का पूरा रहस्य।

स्नान पूर्णिमा के बाद क्यों बंद होते हैं कपाट?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नान मंडप पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अत्यधिक शीतल जल से स्नान करने के कारण महाप्रभु को तेज बुखार आ जाता है। इस विशेष काल को 'अनावसर काल' (Jagannath Anasara 2026) कहा जाता है। आम इंसानों की तरह ही बीमार होने पर भगवान को भी पूर्ण विश्राम की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि अगले 15 दिनों तक आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के मुख्य कपाट बंद कर दिए जाते हैं और प्रभु 'अनासर घर' (एकांतवास) में चले जाते हैं।

अनासर काल में कैसे होती है भगवान की सेवा?

अनावसर काल के दौरान भगवान जगन्नाथ का बिल्कुल एक मरीज की तरह ख्याल रखा जाता है। इस दौरान मंदिर के विशेष सेवक (दैतापति) प्रभु की गुप्त सेवा करते हैं।

जड़ी-बूटियों का लेप: भगवान को ठीक करने के लिए विशेष आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, मोदक और काढ़े का भोग लगाया जाता है।

सात्विक और हल्का आहार: इन दिनों प्रभु को छप्पन भोग नहीं, बल्कि केवल फल और औषधीय अर्क अर्पित किया जाता है।

अंगराग और श्रृंगार: ठीक होने के बाद प्रभु के विग्रहों का विशेष पारंपरिक प्राकृतिक रंगों एवं औषधीय लेप से पुनरुद्धार (अंगराग) किया जाता है।

अलारनाथ मंदिर का क्या महत्व है?

जब पुरी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन बंद होते हैं, तब इस दौरान उड़ीसा के ही ब्रह्मगिरि में स्थित अलारनाथ मंदिर का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। मान्यता है कि अनावसर काल के दौरान भगवान जगन्नाथ स्वयं अलारनाथ रूप में वहां साक्षात निवास करते हैं। जो भक्त पुरी में दर्शन नहीं कर पाते, वे अलारनाथ जाकर प्रभु का आशीर्वाद लेते हैं।

कब होंगे फिर से दर्शन?

15 दिनों के कड़े उपचार और विश्राम के बाद, जब महाप्रभु पूरी तरह स्वस्थ होकर गर्भगृह से बाहर आते हैं, तो उस दिव्य रूप को 'नवयुवन रूप' या 'नेत्रोत्सव' कहा जाता है। अपने नए और ओजस्वी रूप में प्रभु को देखकर भक्तों की आंखें सजल हो उठती हैं।

यह नवयुवन दर्शन वास्तव में उस भव्य रथयात्रा की आधिकारिक शुरुआत है, जिसका इंतजार पूरी दुनिया को रहता है। इसके तुरंत बाद महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल और नक्काशीदार रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे। यह अनूठी परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति के नियम और सेहत के सिद्धांत ईश्वर के मानवीय स्वरूप पर भी उतने ही लागू होते हैं, जितने हम इंसानों पर।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।

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