कभी-कभी जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब किसी मासूम की जान बचाने, किसी परिवार को टूटने से रोकने या किसी बड़े अन्याय को टालने के लिए झूठ बोलना पड़ता है। गीता के अनुसार ऐसे कर्म का मूल्य उसके उद्देश्य से तय होता है। यदि मन में स्वार्थ, छल या अहंकार नहीं है और उद्देश्य केवल किसी की भलाई है, तो वह झूठ पाप नहीं माना जाता।