
Purushottam Yog: जानिए पुरुषोत्तम योग का महामंत्र (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)
Purushottam Yog Bhagavad Gita Chapter 15: भागदौड़ भरी जिंदगी, करियर का तनाव और रिश्तों के उलझाव के बीच क्या कभी आपने सोचा है कि इस पूरे ब्रह्मांड और मानव जीवन का कंट्रोल रूम कहां है? द्वापर युग में कुरुक्षेत्र के मैदान पर जब अर्जुन दिग्भ्रमित हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद्गीता के 15वें अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 15) में एक ऐसी गुप्त विद्या दी थी, जो आज के कॉरपोरेट और मानसिक तनाव के दौर में भी उतनी ही अचूक है। इस अध्याय को पुरुषोत्तम योग (Purushottam Yog) कहा जाता है।
श्रीकृष्ण (Lord Krishna) ने इसमें संसार की तुलना एक ऐसे अश्वत्थ (बरगद) के पेड़ से की है, जिसकी जड़ें ऊपर आसमान (ईश्वर) की ओर हैं और शाखाएं नीचे संसार की तरफ फैली हैं। यानी, जिसे हम अंत मान रहे हैं, शुरुआत असल में वहीं से है।
इस दिव्य अध्याय की शुरुआत होती है संसार के अनोखे वर्गीकरण से। श्रीकृष्ण कहते हैं
'ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्' अर्थात, यह संसार एक शाश्वत वृक्ष की तरह है। इसकी जड़ें परमेश्वर हैं, और इसकी पत्तियां वेद के छंद हैं। जो इस वृक्ष के रहस्य को समझ लेता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है। आज का युवा जिसे 'करियर ग्रोथ' या 'भौतिक सुख' समझकर टहनियों में भटक रहा है, गीता उसे सीधे जड़ों (आत्मज्ञान) से जुड़ने का रास्ता दिखाती है।
इस अध्याय का सबसे खूबसूरत हिस्सा वह है जहां श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में प्रत्येक जीवित प्राणी मेरा ही एक शाश्वत अंश है (ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः)। हमारे शरीर में काम करने वाली पांचों इंद्रियां और मन, प्रकृति के जाल में बंधे हैं, लेकिन जो जीवन शक्ति (Soul) हमारे भीतर है, वह सीधे परमात्मा से जुड़ी है।
आज जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) और मशीन लर्निंग की तरफ भाग रही है, तब अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस हो रही है।
आधुनिक वैज्ञानिक मानते हैं कि ब्रह्मांड की हर चीज एक ऊर्जा (Energy) से संचालित है। गीता का 15वां अध्याय हजारों साल पहले ही घोषित कर चुका है कि सूर्य की रोशनी, चंद्रमा का तेज और अग्नि की तपन सब उसी एक परम सत्ता की ऊर्जा का विस्तार हैं (यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्)।
इस अध्याय में स्वास्थ्य और आयुर्वेद का भी एक बड़ा सूत्र छिपा है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही सभी जीवों के शरीर में 'वैश्वानर' (जठराग्नि या डाइजेस्टिव फायर) बनकर रहता हूं और प्राण-अपान वायु के सहयोग से चार प्रकार के भोजन (चबाने वाले, चूसने वाले, चाटने वाले और पीने वाले) को पचाता हूं। यह सीधा संकेत है कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि भीतर बैठे ईश्वर की तृप्ति के लिए किया जाना चाहिए।
पुरुषोत्तम योग केवल पूजा-पाठ की किताब का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भटके हुए मन को ठहराव देने की गाइडबुक है। जब तक हम संसार रूपी पेड़ की टहनियों (आकर्षण, मोह, क्रोध) को कुल्हाड़ी से काटना नहीं सीखेंगे, तब तक उस परम पद को नहीं पा सकेंगे जहां पहुंचकर मनुष्य कभी दुखी नहीं होता। यदि जीवन में असमंजस की स्थिति हो, तो गीता के इस छोटे से मगर सबसे शक्तिशाली अध्याय के 20 श्लोकों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके देखिए, जिंदगी देखने का नजरिया बदल जाएगा।
Published on:
09 Jun 2026 06:19 pm
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