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वैशाख शुक्ल अष्टमी पर रखा जाएगा ‘Vrishabh Vrat 2026’, दान-पुण्य के लिए विशेष संयोग

Vrishabh Vrat Puja Vidhi: वृषभ व्रत 2026 का पर्व 22 जून को मनाया जाएगा। भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित इस व्रत का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। जानिए व्रत की तिथि, धार्मिक मान्यता, पूजा-विधि और इस दिन दान-पुण्य का क्या महत्व बताया गया है।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jun 18, 2026

Vrishabh Vrat Date 2026, Lord Shiva Vrat 2026

Vrishabh Vrat Date 2026 : वृषभ व्रत 2026: 22 जून को रखा जाएगा विशेष शिव व्रत, जानें तिथि, महत्व और पूजा विधि (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Vrishabh Vrat Date 2026: वृषभ व्रत 2026 इस वर्ष 22 जून को मनाया जाएगा। भगवान शिव और माता पार्वती (Shiva Parvati Puja) की आराधना को समर्पित इस व्रत का वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना, व्रत और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व माना गया है। शिव भक्तों के लिए यह दिन आध्यात्मिक साधना और पुण्य कर्मों का अवसर माना जाता है। आइए जानते हैं वृषभ व्रत (Vrishabh Vrat 2026) की तिथि, धार्मिक महत्व, पूजा-विधि और इससे जुड़ी प्रमुख मान्यताओं के बारे में।

स्कंद पुराण में क्या है वृषभ व्रत का महत्व

पौराणिक ग्रंथों और विशेषकर स्कंद पुराण में इस व्रत (Vrishabh Vrat 2026) की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह कोई साधारण व्रत नहीं है; धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं भगवान विष्णु ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए यह व्रत किया था, जिसके बाद उन्हें उनके प्रसिद्ध वाहन गरुड़ की प्राप्ति हुई थी।

केवल विष्णु जी ही नहीं, बल्कि:

  • देवराज इंद्र को इसी व्रत के प्रताप से ऐरावत हाथी मिला।
  • सूर्य देव को सात घोड़ों का रथ और चंद्र देव को दिव्य रूबी विमान मिला।
  • यमराज को उनका वाहन भैंसा और धनकुबेर को चमत्कारी 'पुष्पक विमान' इसी तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त हुआ था।

वृषभ व्रत 2026 पूजा विधि: कैसे करें शिव-पार्वती की आराधना

ज्योतिष गणना के अनुसार, जब सूर्य देव वृषभ राशि में प्रवेश करते हैं, तब शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। इस बार अष्टमी तिथि का समय इस प्रकार रहेगा:

नोट: उदयातिथि के अनुसार, व्रत 22 जून 2026, दिन सोमवार को ही रखा जाएगा। सोमवार का दिन होने के कारण इस व्रत का महत्व और अधिक बढ़ गया है, क्योंकि सोमवार स्वयं भगवान शिव का दिन है।

पूरे देश में अलग नाम, पर आस्था एक

भारत की सांस्कृतिक विविधता इस व्रत में भी साफ झलकती है। दक्षिण भारत के राज्यों में इसे 'वृषभ संक्रांति' या वृषभ संक्रणम के नाम से जाना जाता है, जबकि ओडिशा में इसे स्थानीय भाषा में ब्रूष संक्रांति कहा जाता है। यह दिन जितना शिव भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है, उतना ही विष्णु उपासकों के लिए भी फलदायी माना जाता है। इस दिन देश के प्रमुख शिव और विष्णु मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

वृषभ व्रत के दिन दान-पुण्य और पितृ तर्पण का महत्व

इस पावन दिन का धार्मिक महत्व केवल व्रत तक सीमित नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, वृषभ व्रत के दिन पितृ तर्पण (श्राद्ध) करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और पितृदोष से मुक्ति मिलती है।

इसके साथ ही, इस दिन गौ-दान (गाय का दान) करने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया दान सीधे अक्षय पुण्य में बदल जाता है। यदि आप गाय का दान करने में असमर्थ हैं, तो किसी गरीब या जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र या धन का दान देकर भी भगवान शिव का आशीर्वाद पा सकते हैं।

वृषभ व्रत में किन नियमों का पालन करना चाहिए

ब्रह्म मुहूर्त में उठें: व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर भगवान शिव और माता उमा (पार्वती) का ध्यान करें, जो नंदी (वृषभ) पर विराजमान हों। इसके बाद पवित्र स्नान करें।

मूर्ति स्थापना: इस दिन सोने या चांदी से बनी 'ऋषभारूढ़' (नंदी पर सवार शिव-पार्वती) की मूर्ति की पूजा का विधान है। अगर यह उपलब्ध न हो, तो मिट्टी या तांबे की मूर्ति का उपयोग भी किया जा सकता है।

पंचामृत से अभिषेक: मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से शुद्ध करें।

विशेष भोग: भगवान को चावल से बनी खीर (पायसम) और मीठे चावल का भोग लगाएं।

भूमि शयन का नियम: इस व्रत का एक कड़ा नियम यह है कि व्रत रखने वाले श्रद्धालु को उस रात गद्दे पर नहीं, बल्कि साफ जमीन (फर्श) पर सोना होता है।

अगले दिन दान: अगले दिन सुबह पुनः पूजा करने के बाद उस मूर्ति को किसी सच्चे शिव भक्त या ब्राह्मण को आदरपूर्वक दान कर देना चाहिए।

आने वाले वर्षों में कब पड़ेगा वृषभ व्रत

यदि आप इस वर्ष के बाद भी इस व्रत को जारी रखना चाहते हैं, तो आगामी वर्षों की तिथियां इस प्रकार हैं:

  • 2027: 11 जून, शुक्रवार
  • 2028: 31 मई, बुधवार
  • 2029: 19 जून, मंगलवार
  • 2030: 09 जून, रविवार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पौराणिक काल में राजा-महाराजा अपने साम्राज्य के विस्तार और सौभाग्य को दोगुना करने के लिए यह व्रत रखते थे। आज के आधुनिक दौर में, यदि आप मानसिक तनाव, आर्थिक तंगी या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो 22 जून को पूरी श्रद्धा के साथ यह व्रत रखकर अपने जीवन में खुशियों का नया सवेरा ला सकते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।