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नारी की भूमिका-1

मानव रूप में तो नर और नारी दोनों में ही दोनों गुण रहते हैं। नर में स्त्री भाव, नारी में नर भाव भी होता है। यही हमारी अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा है।

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Gulab Kothari

Dec 25, 2017

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हम सभी को प्रकृति ने बनाया है। प्रकृति ही हमको चलाती भी है। अत: प्रकृति के स्वरूप की जानकारी एवं उसके साथ तारतम्य का होना सुखी जीवन की पहली आवश्यकता है। प्रकृति में दो ही तत्त्व होते हैं-पदार्थ और ऊर्जा। पदार्थ को हम ब्रह्म कहते हैं। ऊर्जा को माया के नाम से जानते हैं। ब्रह्म में स्थायी भाव है। माया गतिमान तत्त्व है। माया को ही ब्रह्म की शक्ति कहा जाता है। कार्य लक्ष्मी करती है, नाम विष्णु का। सृष्टि विस्तार सरस्वती करती है, नाम ब्रह्मा का। शक्ति ही नर भाव की पूर्णता है। पुरुष तो दोनों हैं। स्त्री भी पुरुष है। मानव रूप में तो नर और नारी दोनों में ही दोनों गुण रहते हैं। नर में स्त्री भाव, नारी में नर भाव भी होता है। यही हमारी अद्र्धनारीश्वर की अवधारणा है।

हमारे जीने के दो धरातल होते हैं। एक प्राकृतिक धरातल। दूसरा सांसारिक धरातल। प्राकृतिक धरातल से आत्मा जुड़ा रहता है। यह मरता भी नहीं है और जन्म भी नहीं लेता। सांसारिक धरातल शरीर, मन और बुद्धि से जुड़ा रहता है। ये माता-पिता से प्राप्त होते हैं। शरीर का नर और नारी रूप में भेद रहता है, सृष्टि विकास के कारण। मन और बुद्धि एक जैसे ही कार्य करते हैं। किन्तु कार्य भेद अवश्य रहता है। स्वभाव भेद भी होता है।

सृष्टि यज्ञ
ब्रह्म फैलाव करता है। एक से अनेक होने की कामना वाला है। उसके पास बीज होता है। नारी संकुचन धर्मा है। ग्रहणशील और पोषण करने वाली है। अत: नर रूप बुद्धि से और नारी मन से अधिक जीते हैं। बुद्धि सूर्य से आती है, अत: पुरुष का स्वभाव उष्ण होता है। मन का राजा चन्द्रमा है, शीतल है। नारी मन में मिठास, वात्सल्य, स्नेह, करुणा आदि विशेष होते हैं। उसे लालन-पालन करना पड़ता है। पुरुष अग्रि रूप, स्त्री सोम रूप। पदार्थ को सोम कह सकते हैं। अग्रि में सोम की आहुति से यज्ञ पूर्ण होता है। हमारी सम्पूर्ण सृष्टि अग्रि और सोम से ही चलती है। युगल रूप में। नर-नारी भी युगल रूप में सृष्टि यज्ञ को चलाते हैं। अकेले यज्ञ का कारक नहीं बन सकते। जहां दो के संयोग से नया निर्माण होता है, यज्ञ कहलाता है।

प्रकृति रूप
स्त्री गतिशील है। स्त्री जननी है। स्त्री ही प्रकृति रूप में पुरुष के साथ जीवन चलाती है। नर नहीं चला सकता। किसी भी परिवार को देख लें, घर-गृहस्थी की सारी गतिविधियां स्त्री के हाथ में रहती हैं। वही केन्द्र है। उसी का माया भाव पुरुष को घेरे में रखकर भोगता है। इसमें उसकी भीतर की शक्तियां ही अधिक काम आती हैं। जन्म से ही स्त्री अधिक समझदार एवं चतुर होती है। उसको देव गुरु बृहस्पति और असुर गुरु शुक्राचार्य की नीतियां समझ में आती हैं। अत: उसकी भाषा भी परोक्ष ही अधिक होती है। संकेतों से भी काम चला लेती है। बच्चे के रोने में भेद को समझ सकती है।

स्त्री जीवन के दो विशेष पहलू हैं-पत्नी और मां के रूप में। उसका पत्नी रूप सृष्टि से जुड़ा रहता है। पुरुष शरीर में सात पुरुष पीढिय़ों के अंश रहते हैं। स्त्री शरीर में सात स्त्री पीढिय़ों के अंश विद्यमान रहते हैं। पत्नी-पति पहले सृष्टि विकास करते हैं। बाद में स्वयं मोक्ष की तैयारियां करते हैं। वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमों में। बिना पत्नी के पति को मोक्ष मिल पाना लगभग असंभव ही है। पत्नी ही पुरुष के पौरुष को जाग्रत करती है, कामना बनकर। उसमें मिठास भरती है। वरना वह तो उष्ण है।