पुरुषोत्तम मास 2020 कब : जानें अधिकमास में क्या करें व क्या न करें...

: पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम...

: अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु...

By: दीपेश तिवारी

Published: 15 Jun 2020, 01:42 PM IST

नव संवत्सर 2077 में इस बार तीन साल बाद एक माह अधिकमास का भी होगा। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। संवत्सर के अनुसार इसमें 12 की बजाए 13 महीने होंगे। यह संयोग हर तीन साल में एक बार बनता है। पंडित सुनील शर्मा के अनुसार विक्रम संवत्सर 2077 की शुरुआत 25 मार्च से हो चुकी है। इसका नाम प्रमादी है और इसके राजा बुध और मंत्री चंद्र हैं।

वहीं इस साल में आश्विन मास के दो महीने होंगे। आश्विन माह 3 सितंबर से 31 अक्टूबर तक रहेगा। यानी इसकी अवधि करीब दो माह रहेगी।

इन दो माह में बीच की अवधि वाला एक माह का समय अधिमास रहेगा। पितृमोक्ष अमावस्या के बाद 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक पुरुषोत्तम मास रहेगा। इस कारण 17 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि पर्व शुरू होगा।

वहीं जानकारों के अनुसार 13वां माह पुरुषोत्तम मास रहेगा, लेकिन इसके कारण विवाह मुहूर्त में कोई बाधा नहीं रहेगी।

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पुरुषोत्तम मास के बाद जितने भी त्यौहार आएंगे वे 10 से 15 दिन या इससे कुछ अधिक विलंब से आएंगे। दीपावली इस बार 14 नवंबर को होगी और देवउठनी एकादशी 25 नवंबर को आएगी।

क्या और कब होता है पुरुषोत्तम माह / अधिकमास
पं. शर्मा के अनुसार सूर्य की बारह संक्रांति के आधार पर ही वर्ष में 12 माह होते हैं। प्रत्येक तीन वर्ष के बाद पुरुषोत्तम माह आता है। वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है।

इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है।

दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है।

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नाम पुरुषोत्तम मास क्यों
अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक बड़ी ही रोचक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है।

पं. सुनील शर्मा के अनुसार मान्यता के मुताबिक भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अधिकमास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार ना हुआ।

ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने ऊपर लें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मास पुरुषोत्तम मास बन गया।

अधिकमास में क्या करें
आमतौर पर अधिकमास में हिंदू श्रद्धालु व्रत- उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है।

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ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं, उनके पापों का शमन करते हैं और उनकी समस्त इच्छाएं पूरी करते हैं। इस मास में जमीन पर शयन, एक ही समय भोजन करने से अनंत फल प्राप्त होते हैं।

पुरुषोत्तम मास का खास मंत्र : देगा अक्षय पुण्य फल...
मंत्र : गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्।
गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्।।

अधिक मास में इनका करें दान : पक्ष के अनुसार...
कृष्ण पक्ष का दान
(1) घी से भरा चांदी का दीपक (2) सोना या कांसे का पात्र (3) कच्चे चने (4) खारेक (5) गुड़, तुवर दाल (6) लाल चंदन (7) कर्पूर, केवड़े की अगरबत्ती (8) केसर (9) कस्तूरी (10) गोरोचन (11) शंख (12) गरूड़ घंटी (13) मोती या मोती की माला (14) हीरा या पन्ना का नग

शुक्ल पक्ष का दान
(1) माल पुआ (2) खीर भरा पात्र (3) दही (4) सूती वस्त्र (5) रेशमी वस्त्र (6) ऊनी वस्त्र (7) घी (8) तिल गुड़ (9) चावल (10) गेहूं (11) दूध (12) कच्ची खिचड़ी (13 ) शक्कर व शहद (14) तांबे का पात्र (15) चांदी का नन्दीगण।

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18 सितंबर से अधिकमास...
संवत्सर 2077 में अधिमास की दो तिथियां कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तथा शुक्ल पक्ष की तृतीया का क्षय 18 अक्टूबर को है। इस कारण 17 सितंबर को श्राद्ध पक्ष के एक माह बाद 17 अक्टूबर को शारदीय नवरात्र आरंभ होगा। श्राद्धपक्ष की सर्व पितृ अमावस्या के अगले दिन नवरात्र शुरू हो जाते हैं, लेकिन अमावस्या व नवरात्र के बीच पूरे एक माह का अंतर होगा।

पंडितों व जानकारों के अनुसार पंचांग गणना के अनुसार 3 सितंबर कृष्ण पक्ष एकम से आश्विन माह शुरू होगा, जो 31 अक्टूबर तक रहेगा। इस अवधि में 18 सितंबर को अधिकमास के रूप में प्रथम आश्विन की शुरु होकर 16 अक्तूबर तक चलेगा।। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। इसे अधिकमास की संज्ञा भी दी गई है।

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19 साल बाद फिर बना ये योग
पंडित शर्मा के अनुसार दो आश्विन मास वाला अधिकमास का योग 19 साल बाद आ रहा है। इसके पूर्व वर्ष 2001 में आश्विन में अधिकमास का योग बना था। इस वर्ष 2020 में आश्विन मास अधिकमास होगा, इसलिए दो आश्विन रहेंगे। अधिकमास 18 सितंबर से शुरू होकर 16 अक्तूबर तक चलेगा।

इसके कारण व्रत-पर्वों में 15 दिन का अंतर आ रहा है। यानी जनवरी से अगस्त तक आने वाले त्योहार करीब 10 दिन पहले और सितंबर से दिसंबर तक होने वाले त्योहार 10 से 15 दिन की देरी से आएंगे।

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