नहीं रहे कैराना सांसद बाबू हुकम सिंह, जानिए उनसे जु़डी कुछ खास बातें

नहीं रहे कैराना सांसद बाबू  हुकम सिंह, जानिए उनसे जु़डी कुछ खास बातें
कैराना सांसद बाबू हुकुम सिंह

shivmani tyagi | Publish: Feb, 03 2018 11:33:35 PM (IST) Saharanpur, Uttar Pradesh, India

सपा सरकार में वेस्ट यूपी से हिंदुआें के पलायन का मुद्दा उठाने वाले कैराना सांसद बाबू हुकम नहीं रहे

सहारनपुर।
उत्तर प्रदेश के कैराना से वर्तमान सांसद बाबू हुकुम सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया नोएडा के जेपी हॉस्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। भाजपा से सांसद रहे हुकुम सिंह ने पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कैराना से हिंदुओं के पलायन की आवाज उठाई थी और उसके बाद वह पूरे देश में सुर्खियों में आ गए थे। पिछले करीब 15 दिनों से उनका उपचार चल रहा था और शनिवार शाम करीब 8:00 बजे उन्होंने नोएडा के जेपी अस्पताल में दम तोड़ दिया। हुकुम सिंह की मौत हो जाने की खबर से राजनीतिक गलियारों में दुख फैल गया है। सहारनपुर के सांसद राघव लखन पाल शर्मा ने बाबू हुकुम सिंह के निधन की पुष्टि करते हुए बताया कि राजनीति में उनकी कमी अब कभी पूरी हो सकेगी। भारी मन से सांसद ने कहा कि बाबू जी का आशीर्वाद हमेशा उन्हें मिला है और उनके निधन की खबर से आज वह बेहद दुखी हैं।

1938 में हुआ था जन्म
5 अप्रैल 1938 को जन्मे बाबू हुकुम सिंह स्कूल टाइम से ही पढ़ाई में अव्वल थे। कैराना में इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय ज्वाइन किया, जहां से उन्होंने बीए और फिर एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।

राजनीति से पहले वकालत को बनाया पेशा
राजनीति में आने से पहले सांसद बाबू हुकुम सिंह ने वकालत को अपना पेशा बनाया था। 13 जून 1958 को उनकी शादी रेवती सिंह से हुई। शादी के बाद बाबू हुकुम सिंह ने वकालत के अपने पेशे को बढ़ावा दिया और प्रेक्टिस तेज कर दी।

पीसीएस जे की परीक्षा भी कर ली थी पास लेकिन इसलिए नहीं जज
वकालत की प्रैक्टिस करने के दौरान ही हुकुम सिंह ने जज बनने की परीक्षा पीसीएस (जे) भी पास कर ली। बाबू हुकुम सिंह के करीबी बताते हैं कि इससे हले कि वह जज की नौकरी शुरू करते, चीन ने भारत पर हमला कर दिया और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने युवाओं से देशसेवा के लिए सेना में भर्ती होने के आह्वान किया। इस दौरान बाबू हुकुम सिंह सेना में भर्ती होने के लिए पहुंच गए और भारतीय सेना को ज्वाइन कर लिया। इस तरह 1965 में पाकिस्तान के हमले के समय अपनी टुकड़ी के साथ बाबू हुकुम सिंह ने पाकिस्तानी सेना का सामना भी किया। इस समय कैप्टन हुकुम सिंह राजौरी के पूंछ सेक्टर में तैनात थे। इस तरह वे कई वर्षों तक भारतीय सेना में रहे और जब हालात सामान्य हो गए तो उन्होंने 1969 में सेना से इस्तीफा दे दिया और फिर से वकालत करने लगे।

 

बार संघ के चुनाव से राजनीति में रखा कदम
भारतीय सेना में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ चुके बाबू हुकुम सिंह वकीलों के बीच काफी लोकप्रिय हो चुके थे और यही कारण रहा कि उन्हे बार संघ का चुनाव भी लड़ना पड़ा। 1970 में वह चुनाव जीत गए और इसी जीत के साथ उन्होंने राजनीति में कदम बढा दिए। राजनीति में कदम रखने के बाद कुछ ही दिनों में हुकुम सिंह बेहद लोकप्रिय हो गए और उनकी लोकप्रियता को देखते हुए कांग्रेस और लोकदल ने उन्हें टिकट देने की पेशकश की। इस दाैरान उन्हाेंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और वह जीत गए। इस तरह वह विधानसभा सदस्य बने और फिर 1980 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। कांग्रेस को छोड़ने के बाद उन्होंने लोकदल से चुनाव लड़ा और इस पार्टी से भी चुनाव जीत गए। तीसरी बार 1985 में भी उन्होंने लोकदल के टिकट पर ही चुनाव जीता। इसके बाद जब नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हुकुमसिंह को राज्यमंत्री से कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया।


जानिए कब-कब क्या बने हुकुम सिंह
1981-82 में हुक्म सिंह लोकलेखा समिति के अध्यक्ष बने। 1975 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के महामंत्री बने। इसके बाद 1980 में लोकदल के अध्यक्ष भी हो गये। 1984 में विधानसभा के उपाध्यक्ष रहे और 1995 में हुकुमसिंह ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा इस चुनाव को जीतकर चौथी बार विधायक बनकर रिकॉर्ड बनाया। 2007 चुनाव में भी विधानसभा पहुंचे। 2012 में बाबू हुकुम सिंह कैराना सीट से विधायक आैर विधायक रहते हुए ही सांसद बन गए। 2013 में बाबू हुकम सिंह पर मुजफ्फरनगर दंगों के आरोप भी लगे। 2014 में भाजपा को हुक्म सिंह ने कैराना सीट पर जीत दिलाई। इस दौरान भाजपा पार्टी को पार्टी को उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व सफलता मिली। सांसद हुकुम सिंह कैराना से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा उठाया और यह मुद्दा नेशनल मुद्दा बन गया जिसके बाद भाजपा को वेस्ट यूपी में मजबूत जमीन मिली।

2009 में लाेक सभा का चुनाव हार गए थे बाबू हुकुम सिंह

बाबू हुकुम सिंह का राजनीतिक कैरियर बेहद शानदार रहा लेकिन राजनीति जीत के साथ-साथ हार भी चलती है। यही कारण रहा कि कद्दावर नेता रहे बाबू हुकुम सिंह भी 2009 में लाेकसभा का चुनाव हार गए थे। इसके बाद वर्ष 2017 में इनकी बेटी मृगांका भी चुनाव हार गई आैर मृगांका काे हुकम सिंह के कट्टर विराेधी रहे मरहूम सांसद मनव्वर हसन के बेटे नाहिद हसन ने हरा दिया था।

साेमवार काे नहीं चलेगी संसद की कार्यवाही

सांसद बाबू हुकुम सिंह के निधन पर राजनीतिक गलियाराें में दुःख की लहर फैल गई है। हुकुम सिंह के निधन पर साेमवार काे संसद की कार्यवाही भी नहीं चलेगी।

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