
शहीद सीताराम राय और उनकी अंतिम यात्रा (फोटो-सोशल मीडिया)
बिहार के वीर सपूत हवलदार सीताराम राय ने जम्मू-कश्मीर के बर्फीले पहाड़ों के बीच आतंकवादियों से लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनका पार्थिव शरीर शुक्रवार सुबह समस्तीपुर स्थित उनके पैतृक गांव लोदीपुर पहुंचा। जैसे ही सेना का वाहन गांव की सीमा में दाखिल हुआ, पूरा इलाका 'सीताराम राय अमर रहें' और 'भारत माता की जय' के नारों से गूंज उठा। 22 वर्षों तक देश के बॉर्डर की रक्षा करने वाला यह 40 वर्षीय जांबाज सिपाही आज तिरंगे में लिपटा हुआ, आखिरी बार अपने घर लौटा। शहीद को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए लोगों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा।
जब शहीद का पार्थिव शरीर उनके घर के आंगन में रखा गया, तो वहां का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक था। शहीद की पत्नी सुमन राय अपने पति के शरीर से लिपट गईं और फूट-फूटकर रो पड़ीं। वह बार-बार बेहोश हो जाती थीं और होश में आने पर बस एक ही बात कह रही थीं, 'उठ जाओ, प्लीज… बस एक आखिरी बार मुझसे बात कर लो।'
माहौल तब और भी अधिक हृदयविदारक हो गया, जब सुमन राय ने मौके पर मौजूद जिलाधिकारी रोशन कुशवाहा का हाथ थाम लिया और बेकाबू होकर रोते हुए पूछा, 'साहब, वो तो देश के लिए चले गए, लेकिन अब हमारे बच्चों का सहारा कौन बनेगा? हमने तो अपना सब कुछ खो दिया है।' शहीद की पत्नी के इस दर्दनाक विलाप को देखकर, वहां मौजूद पुलिस अधिकारी और ग्रामीण भी अपने आंसू नहीं रोक पाए। दिव्यांग
शहीद सीताराम राय का 14 साल का बेटा, जो दोनों पैरों से दिव्यांग है आज अपने बहादुर पिता का अंतिम संस्कार करेगा और चिता को मुखाग्नि देगा। परिवार वालों ने बताया कि सीताराम अपने बेटे के इलाज और भविष्य को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। वह चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई-लिखाई करे और आत्मनिर्भर बने। अभी 15 दिन पहले ही वह अपने रिश्तेदार के बेटे की शादी में शामिल होने घर आए थे और अप्रैल में फिर से आने का वादा करके गए थे। वह अपने घर का निर्माण कार्य भी पूरा करना चाहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
शहीद के पिता सूरज राय की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि कैसे सालों तक उन्होंने कोलकाता की सड़कों पर हाथगाड़ी चलाकर अपने बच्चों को पाला-पोसा और सीताराम को पढ़ाया-लिखाया। भारी आवाज में सूरज राय ने कहा, 'मैंने घोर गरीबी देखी थी, इसलिए मैं नहीं चाहता था कि मेरे बेटे को भी वैसी ही तकलीफें झेलनी पड़ें। मैं हमेशा उसे पढ़ाई-लिखाई के लिए प्रोत्साहित करता था। आज यह जानकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है कि मेरे बेटे ने देश की सेवा की, लेकिन साथ ही मेरे बुढ़ापे का सहारा भी टूट गया है।'
सीताराम राय साल 2002 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे। बुधवार की सुबह उन्होंने वीडियो कॉल के जरिए अपनी पत्नी से बात की और बताया कि वह एक जरूरी तलाशी अभियान (ड्यूटी) पर जा रहे हैं। इसके कुछ ही घंटों बाद, उनकी यूनिट से एक फोन आया, जिसमें परिवार को बताया गया कि एक मुठभेड़ के दौरान उन्हें गोली लग गई है। उसी रात 11:00 बजे तक परिवार को उनकी शहादत की आधिकारिक पुष्टि मिल गई।
शहीद को अंतिम विदाई देने के लिए लोगों की करीब एक किलोमीटर लंबी कतार लग गई। स्थानीय विधायक रणविजय साहू, जिलाधिकारी रोशन कुशवाहा और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने शहीद को पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। अंतिम विदाई समारोह पूरे राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ। प्रशासन ने शहीद के परिवार को हर संभव सरकारी सहायता और सम्मान देने का आश्वासन दिया है।
Updated on:
20 Mar 2026 02:13 pm
Published on:
20 Mar 2026 02:10 pm
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