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सतना. शस्त्र लाइसेंस फर्जीवाड़े की जांच में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक हरी सिंह यादव के कार्यकाल में उनके बंगले के पते से जारी शस्त्र लाइसेंसों में से कुछ की मूल नस्तियां ही गायब हैं। एसटीएफ को इस संबंध में फाइल नहीं मिल सकी है। उधर विधायक नीलांशु चतुर्वेदी का नाम लाइसेंस फर्जीवाड़े में आने के बाद राजनीतिक उबाल आ गया है। इसको लेकर सियासत भी शुरू हो गई है। कांग्रेस-भाजपा दोनों एक-दूसरे की सरकारों पर ठीकरा फोड़ रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, तत्कालीन कलेक्टर सुखबीर सिंह के कार्यकाल में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक हरी सिंह यादव के बंगले के पते पर उनके परिजनों के लाइसेंस जारी हुए थे। तत्कालीन एडीएम सुरेश कुमार के नेतृत्व में गठित टीम की जांच में यह पाया गया था कि एसपी बंगले पर जारी किए लाइसेंसों में एसडीएम की अनुशंसा नहीं थी। बिना उनके प्रतिवेदन के ही ये लाइसेंस जारी कर दिए गए थे। जो नियम विरुद्ध हैं लेकिन लाइसेंसों की जांच करने पहुंची एसटीएफ की टीम को मामले से जुड़े लाइसेंसों की मूल नस्तियां नहीं मिली हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा कि आखिर इन नियम विरुद्ध मामलों की नस्तियां कहां गायब हो गईं। शस्त्र शाखा से इस तरह के संवेदनशील अभिलेखों का गायब होना कई सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि यह पहला मामला नहीं है। शस्त्र शाखा से पूर्व में भी कुछ रजिस्टर गायब होने की बात सामने आई थी। जानकारों की मानें तो लगभग 60 शस्त्र लाइसेंसों की नस्तियां गायब हैं जिस वजह से इन मामलों का एसटीएफ परीक्षण नहीं कर पाई। इसी तरह से कलेक्टर बंगले के पते पर जारी लाइसेंस में गड़बड़ी पाई गई है। यह लाइसेंस तत्कालीन कलेक्टर सुखबीर सिंह के पिता के नाम पर है। इसकी सीमा वृद्धि नियम विरुद्ध पाई गई है। इस मामले में भी अभी एसटीएफ ने चुप्पी साध रखी है।
कहां उपयोग हो रहे थे कारतूस
एसटीएफ ने शस्त्र लाइसेंस फर्जीवाड़े में इस बात से भी इनकार नहीं किया कि जिन लाइसेंसों में कारतूसों की संख्या बढ़ाई गई है उनका दुरुपयोग हो रहा था। दरअसल शस्त्र लाइसेसों में जो फर्जीवाड़ा हुआ है उसमें से काफी संख्या में लाइसेंस मझगवां और चित्रकूट इलाके से लगे हुए हैं। दस्यु प्रभावित इस इलाके को लेकर एसटीएफ अब इस दिशा में भी जांच कर रही है कि कहीं इन कारतूसों का उपयोग दस्यु समस्या से जुड़े मामलों में नहीं हो रहा था। दरअसल, नियम विरुद्ध तरीके से बढ़ाए गए कारतूसों का क्या उपयोग किया गया इसका भी कोई रिकार्ड एसटीएफ को नहीं मिला है।
हुआ था बड़ा गड़बड़झाला
तत्कालीन जांच टीम में शामिल रहे लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि चित्रकूट के विवादित लाइसेंस में बड़ी गड़बड़ी पकड़ में आई थी। संबंधित के पास रायफल का लाइसेंस था। इसके बाद उन्होंने पिस्टल रिवॉल्वर लाइसेंस के लिए आवेदन किया। जिसे शासन के पास भेजा गया और उसकी अनुमति भी मिल गई लेकिन उन्होंने नया शस्त्र नहीं खरीदा। पिता को शस्त्र विक्रय की अनुमति और शपथ पत्र के आधार पर यह रिवॉल्वर संबंधित के नाम चढ़ गया। इसी बीच संबंधित ने नई रिवॉल्वर खरीद ली। तब पुन: पिता का शपथ पत्र शस्त्र वापस लेने का आया। इसके आधार पर दस्तावेजों में इंट्री कर दी गई लेकिन पिता के मूल दस्तावेज में इसकी वापसी दर्ज नहीं हुई न ही शस्त्र वापस करने के आदेश का उल्लेख किया गया।
कांग्रेस ने दी सफाई
विधायक नीलांशु चतुर्वेदी के लाइसेंस को लेकर राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा शासन काल में हुए ऐतिहासिक शस्त्र लाइसेंस फर्जीवाड़े का खुलासा कांग्रेस सरकार ने किया और माफियाराज पर बड़ा हमला किया। साथ ही यह भी सफाई दी है कि मामले में नीलांशु का कोई दोष नहीं है। इसके लिए संबंधित अफसर और कर्मचारी दोषी हैं। उधर भाजपा ने पलटवार किया है कि पूरा खुलासा भाजपा शासन में ही हुआ है। विधानसभा तक में सरकार ने जांच का आश्वासन दिया और उसी भाजपा सरकार के आश्वासन पर यह जांच हुई है। एक एमएलए को बचाने के लिये कांग्रेस पूरे मामले पर पानी डालने में जुटी है।
गरमाई सियासत, आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू
कांग्रेस
प्रवक्ता अतुल सिंह परिहार ने जारी बयान में कहा कि शस्त्र लायसेंस फर्जीवाड़े में पूर्व की भाजपा सरकार सीधे तौर पर जिम्मेदार है। यह फर्जीवाड़ा भाजपा सरकार के ऐतिहासिक घोटालों का एक जिंदा सबूत है। 2012-13 के दौरान हुए इस घोटाले ने यह साबित कर दिया है कि पूर्व की भाजपा सरकार पर लगे व्यापम घोटाले, इ-टेंडरिंग घोटाले, निराश्रित विधवा पेंशन घोटाले सहित अन्य कई घोटालों के आरोप पूरी तरह से सही थे। जहां तक चित्रकूट विधायक का इस मामले से कोई वास्ता नही है। उन्होंने सामान्य प्रक्रिया के तहत लाइसेंस का सीमाई क्षेत्र बढ़ाने का आवेदन दिया और उन्हें लाइसेंस दे दिया गया।
भाजपा
भाजपा जिला मीडिया प्रभारी कामता पाण्डेय ने कहा कि शस्त्र लाइसेंस फर्जीवाड़े में कांग्रेस विधायक को बचाने जांच में लीपापोती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। एसटीएफ के माध्यम से जो जांच कराई जा रही है उसके जो तथ्य सामने आ रहे हैं वह जांच प्रक्रिया पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं। पूरी जांच में कांग्रेस के विधायक चतुर्वेदी को बचाने का कुत्सित प्रयास हो रहा जो कि अनुचित है। भाजपा सरकार के समय 300 शस्त्र लाइसेंसों में गड़बड़ी पाई गई थी जिसमें विधायक नीलांशु का भी नाम आया था। तब की जांच रिपोर्ट और अब की जांच रिपोर्ट में अंतर भी है। पहले की जांच में पिता पुत्र के मामले को वर्तमान जांच से हटा देना साबित कर रहा है कि दाल में कुछ काला है।
Published on:
15 Feb 2020 01:02 am
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