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तलाब पर जमीन कारोबारियों को एनजीटी का झटका, दिया स्थगन

तालाब के स्वरूप परिवर्तन मामले में जिला प्रशासन से राहत नहीं मिलने पर जल बिरादरी पहुंची दिल्ली  

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NGT shocks land traders on the pond, postponement

NGT shocks land traders on the pond, postponement

सतना । चित्रकूट रोड में गढ़िया टोला स्थित गेरुहा तालाब में जमीन कारोबारियों द्वारा उसके स्वरूप परिवर्तन का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहुंच गया है। सरकारी मशीनरी की मदद से तालाब के स्वरूप बदले जाने से उसके अस्तित्व पर आए संकट को देखते हुए जल बिरादरी ने नगर निगम, जिला प्रशासन सहित संभागायुक्त तक से गुहार लगाई। लेकिन यहां से कोई मदद नहीं मिलने पर वह मामला एनजीटी ले गई। एनजीटी ने जल बिरादरी के आवेदन को संज्ञान में ले लिया है और यहां सभी प्रकार की गतिविधियों में यथा स्थिति के आदेश जारी कर दिए हैं। जल विरादरी को इस तालाब के स्वत्व से किसी प्रकार की आपत्ति नहीं थी, लेकिन जमीन कारोबारियों ने यहां कब्जा लेते हुए तालाब के अगोल में जिस तरीके से बाउण्ड्री का निर्माण कर तालाब के स्वरूप को परिवर्तित किया था उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरुद्ध बताया था। इस मामले में इस बात का भी विवाद है कि यहां अगोल के हिस्से में एसडीएम और सीएसपी ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इस काम को पूरा करवाया था जबकि इस दौरान स्थानीय जन इसका विरोध कर रहे थे।

एनजीटी को यह दी जानकारी

शहर के गढ़िया टोला स्थित गेरुहा तालाब का स्वरूप परिवर्तित किये जाने और इसका स्वत्व स्थानांतरित किये जाने के खिलाफ धरना प्रदर्शन से शुरू हुई लड़ाई अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक पहुंच गई है। जल बिरादरी ने गेरुहा तालाब पर कब्जा किये जाने और इसे नष्ट किये जाने के पिछले दिनों हुए घटनाक्रम को रोकने के तमाम स्थानीय प्रयासों के नाकाम होने के बाद एनजीटी की चौखट पर दस्तक दी थी। एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच दिल्ली ने इस मसले पर दायर आवेदन नंबर 24 /2019 सीजेड को स्वीकार करते हुए राजस्व रिकार्डों में भूमि स्वामी बने बैठे लोगों के साथ मप्र शासन तथा सीएसपी सतना विजय प्रताप सिंह को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था। प्रकरण की सुनवाई 10 अक्टूबर को होनी थी और अनावेदकों को अपना जवाब प्रस्तुत करना था लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। लिहाजा जल बिरादरी के प्रतिनिधि जे आर नारायण द्वारा अपने अधिवक्ता के माध्यम से की गई मांग को स्वीकार करते हुए एनजीटी ने गेरुहा तालाब के मामले में यथास्थिति बनाये रखने का स्थगन आदेश जारी कर दिया। अब इस प्रकरण की अगली सुनवाई के लिए 24 अक्टूबर तय की गई है।
सभी गतिविधियां थमी

माना जा रहा है कि एनजीटी के यथा स्थिति बनाए रखने के आदेश के बाद जमीन कारोबारियों के अरमानों पर पानी फिर गया है। इस आदेश के बाद अब इस विवादित भूभाग पर किसी भी प्रकार की गतिविधि नहीं की जा सकेगी। न तो यहां अब किसी प्रकार का निर्माण या प्लाटिंग हो सकेगी न ही इस जमीन का क्रय - विक्रय किया जा सकेगा।
राजशाही जमाने का है तालाब

जल बिरादरी ने अपने आवेदन में एनजीटी को बताया है कि वर्ष 1930 में भी गेरुहा तालाब का अस्तित्व था और यह राजस्व रिकार्डों में भी दर्ज था। उस समय इसके भूमि स्वामी महाराजा बहादुर हुआ करते थे। बाद में मौजूदा लोग भूमि स्वामी बन गए और इस तालाब का अस्तित्व मिटाने के प्रयास शुरू कर दिए गए। जबकि तालाब की संरचना अभी भी मौजूद है और उसमे जल भराव भी हो रहा है। एनजीटी को यह भी बताया गया है कि पुलिस और प्रशासन की मदद से तालाब के अंश भाग में चहारदीवारी खड़ी कर ली गई है। जल बिरादरी ने तालाब पर कब्जे के विरोध में प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष गुहार भी लगाई और कई दिनों तक अनशन भी किया। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। एनजीटी से गेरुहा तालाब को बचाए जाने और इसके बेजा कब्जे को हटाए जाने की राहत चाही गई है।

कलेक्टर के यहां भी चल रहा प्रकरण
इस तालाब को बचाने का एक मामला कलेक्टर न्यायालय में भी चल रहा है। लेकिन इस मामले में राजस्व अमले की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। इस मामले में कलेक्टर के निर्देश पर तालाब के स्टेटस संबंधी जानकारी एसडीएम के मांगे जाने के बाद भी यहां के पटवारी समय पर प्रतिवेदन देने में कोई रुचि नहीं दिखाई।
स्थानीय प्रशासन की भूमिका संदिग्ध
इस मामले में जिस तरीके से स्थानीय नागरिकों ने तालाब की जमीन पर कोई भी निर्माण न होने के प्रयास किए थे उसे कलेक्टर के आदेश पर एसडीएम और सीएसपी ने विफल कर दिया था। सैकड़ा भर जवानों की मौजूदगी में यहां सरकारी अफसरों ने खड़े होकर तालाब का स्वरूप बदलने में अप्रत्यक्ष मदद की थी।