
पुष्पेन्द्र पाण्डेय
सतना। सीधी जिले में घड़ियालों के रहवास को उजाड़ने की तैयारी चल रही है। सोन घड़ियाल अभयारण्य के कुछ क्षेत्र को डिनोटिफाई करने का प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है। दावा है कि यह कदम उस क्षेत्र में उठाया जा रहा, जहां वर्तमान में घडि़याल या अन्यजलीय जीव नहीं हैं। यह बात और है कि इन क्षेत्रों में घड़ियालों को बसाने के लिए वैसे प्रयास नहीं हुए जैसे होने चाहिए। सोमवार को संभागीय बैठक में कमिश्नर रीवा संभाग गोपालचंद्र डाड से डिनोटिफाई के संबंध में प्रस्ताव भेजने की पुष्टि अधिकारियों ने की। यह अभयारण्य घड़ियालों, मगरमच्छों, कछुओं, पक्षियों सहित कई लुप्तप्राय और संकटग्रस्त वन्यजीवों का घर है। इस कदम से घडि़यालों पर संकट तो आएगा ही जलीय जीवों पर खतरा और जैवविविधता को भी नुकसान होगा।
दुनिया के लुप्तप्राय प्रजातियों में है घड़ियाल
घड़ियाल दुनिया की सबसे लुप्तप्राय प्रजातियों में से हैं। इनके संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल के तहत 1981 में वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 18 (1) के प्रावधान पर सोन घड़ियाल अभयारण्य की स्थापना सीधी जिले में की गई थी। 210 किमी क्षेत्रफल का यह अभयारण्य 161 किमी सोन नदी, 23 किमी बनास नदी और 26 किमी गोपद नदी पर है।
पर्दे के पीछे की कहानी
सोन घड़ियाल अभयारण्य के हिस्सों को डिनोटिफाई करने की पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। जानकार बताते हैं कि 210 किमी का यह क्षेत्र किसी भी प्रकार के खनन के लिए प्रतिबंधित है। रेत कारोबारी सोन नदी के कुछ हिस्से से रेत का खनन कर रहे हैं, लेकिन इस क्षेत्र में वे मनमुताबिक खनन नहीं कर पा रहे। जबकि, यहां उच्च गुणवत्ता की रेत है। सरकार के इस कदम से यह क्षेत्र प्रतिबंध मुक्त हो जाएगा और कारोबारियों को रेत खनन की हरीझंडी मिल जाएगी।
पन्ना से सीख लेना चाहिए
पन्ना टाइगर रिजर्व के रिटायर्ड असिस्टेंट डायरेक्टर एमपी ताम्रकार का मानना है कि घडि़याल के रहवास उजाड़ने पर नहीं बल्कि बसाने का प्रयास होना चाहिए। ऐसा करना प्रकृति और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है। सोन घड़ियाल अभ्यारण्य के जिम्मेदारों ने रिजर्व एरिया में घडि़यालों को बसाने की दिशा में कोई बड़ा प्रयास नहीं किया। पन्ना टाइगर रिजर्व 2008 में बाघ विहीन हो गया था। लेकिन, टाइगर रिजर्व प्रबंधन और सरकार ने हार नहीं मानी थी। कड़े संघर्ष के बाद 2009 में वहां बाघ पुनस्र्थापन योजना के तहत बाघ बसाए गए। सरकार चाहती तो 2008 में इसे भी डिनोटिफाई कर देती, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण बाघों का संसार आबाद करने में सफल हुए। सोन घड़ियाल के जिम्मेदारों को भी यहां से सीख लेनी चाहिए।
सब रेत के लिए हो रहा
रिटायर्ड सीसीएफ एसपी तिवारी ने इस निर्णय को गलत बताया। कहा, यह सब रेत खनन के लिए हो रहा है। यदि ऐसा होता है तो ईको सिस्टम प्रभावित होगा। पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ेगा। 2005 में पदस्थापना के दौरान मैं लखनऊ से घडि़याल लाया था। उसके अगले साल सोन घडि़याल अभयारण्य के जोगदहा घाट पर 50-60 बच्चे पैदा हुए थे। वाइल्ड एनिमल्स को बचाने की दिशा में प्रयास होने चाहिए।
यह टीम थी
डिनोटिफाइ रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए पांच सदस्यीय टीम बनी थी। अध्यक्ष सेवनिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं सदस्य मप्र राज्य वन प्राणी बोर्ड डॉ.एचएस पावला को बनाया गया था। सदस्य के रूप में जीपी गोपी जलीय विशेषज्ञ, राजेश राय मुख्य वन संरक्षक वन वृत्त रीवा, साकेत मालवीय कलेक्टर सीधी, अमित कुमार दुबे क्षेत्र संचालक संजय टाइगर रिजर्व सीधी थे।
'' हमारी ओर से ऐसा प्रस्ताव नहीं गया है। हां, एक कमेटी जरूर बनी थी। उसने रिपोर्ट तैयार की है। उस क्षेत्र के स्थानीय निवासियाें की रेत की आवश्यकता की पूर्ति के लिए अगर संभव हुआ तो कुछ हिस्सा डिनोटिफाई करने की तैयारी है। इसमें देखा जाएगा कि वाइल्ड एनिमल्स को नुकसान नहीं हो। यहां घडि़याल के साथ ही मगरमच्छ, कछुआ और विदेशी पक्षी भी हैं '' - निकुंज पाण्डेय, अधीक्षक सोन घड़ियाल अभयारण्य
'' सीएम की मीटिंग में यह विषय आया था। कल की बैठक में हमें बताया गया कि डिनोटिफाई का प्रस्ताव भेज दिया है। ज्यादा जानकारी हमें नहीं है '' - गोपालचंद्र डाड, कमिश्नर, रीवा संभाग
सोन घड़ियाल अभयारण्य एक नजर में
नर घड़ियाल - 00
मादा घड़ियाल - 51
सब एडल्ट- 24
वर्ष 2022 में जन्मे बच्चे- 12
Published on:
14 Feb 2024 02:13 pm
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