
Satna: Councilors will elect mayor after 22 years
सतना. ओबीसी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब नगरीय निकाय के जो चुनाव होंगे उसमें महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से नहीं होगा। अर्थात इस बार जनता सीधे वोट देकर महापौर का चुनाव नहीं करेगी बल्कि अप्रत्यक्ष प्रणाली से पार्षद द्वारा महापौर को चुना जाएगा। यही स्थिति नगर परिषद अध्यक्ष के चुनाव को लेकर भी होगी। राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव राकेश सिंह ने महापौर पद का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से होने की पुष्टि की है।
बनी रही ऊहापोह की स्थिति
इस बार होने वाले नगरीय निकाय चुनावों में महापौर सहित नगर पालिका व नगर परिषद के अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर लोगों में भारी उहापोह की स्थिति बनी हुई है। दरअसल कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने महापौर पद का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराये जाने का विधेयक पारित कर वर्षों पुरानी प्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था को बदल दिया था। कांग्रेस सरकार के वक्त बदली गई व्यवस्था के तहत चुने गये पार्षदों के द्वारा महापौर का चुनाव होना था। हालांकि उस वक्त विपक्ष में बैठी भाजपा ने इसका काफी विरोध किया था। लेकिन सरकार बदलने के बाद शिवराज सरकार ने एक अध्यादेश लाकर महापौर सहित नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्ष के चुनाव की पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी। लेकिन अध्यादेश की वैधता 6 माह ही होती है। उधर शिवराज सरकार प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव का विधानसभा में संशोधन विधेयक प्रस्तुत नहीं कर सकी। लिहाजा मौजूदा हालातों में नगर निगम महापौर सहित नगर पालिका व नगर परिषद के अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही होगा।
22 साल बाद बनी स्थिति
बताया गया है कि पहले नगर निगम महापौर के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही होते थे। लेकिन वर्ष 2000 के बाद से सीधे जनता महापौर का चुनाव करती आ रही है। अब 22 साल बाद एक बार फिर से पार्षदों को महापौर का चुनाव करने का मौका मिलने जा रहा है। इस व्यवस्था से अब पार्षदों का राजनीतिक रसूख ज्यादा मजबूत रहेगा।
कइयों के चेहरे पर दिखी निराशा
सतना नगर निगम महापौर का पद ओबीसी आरक्षित था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से यह पद अब अनारक्षित हो जाएगा। लिहाजा इस बार महापौर पद के लिये कई दावेदार तैयार हो रहे थे। लेकिन जब उन्हें महापौर पद का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से होने की जानकारी लगी तो उनके चेहरे पर मायूसी स्पष्ट नजर आने लगी है। उनका मानना है कि इस व्यवस्था के तहत धनबल काफी प्रभावी भूमिका में होगा और जो इससे मजबूत होगा वही महापौर बन सकेगा। जबकि प्रत्यक्ष चुनाव में धन बल से ज्यादा लोकप्रियता मायने रखती है। इस व्यवस्था से ज्यादा निराशा सत्ताधारी दल के दावेदारों में ही नजर आ रही है।
Published on:
14 May 2022 02:58 pm
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