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satna: सतना जिले में लगातार घट रही आदिवासियों की जमीन

400 हैक्टेयर से ज्यादा जमीनें गैर आदिवासियों ने खरीदीं ज्यादातर बिकी जमीनों पर प्लाटिंग या खदान का कारोबार

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satna: सतना जिले में लगातार घट रही आदिवासियों की जमीन

The land of tribals is continuously decreasing in Satna district

सतना। जिले में आदिवासियों की जमीनें लगातार घटती जा रही हैं। अकेले 20 साल में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति की 414 हैक्टेयर से ज्यादा जमीने घट गई हैं और ये जमीनें गैर आदिवासियों को बेची गई हैं। जिले में आदिवासियों की ज्यादातर जमीनों पर खदानों का काम किया जा रहा है या फिर इनका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। शहरी क्षेत्र में जितनी भी जमीनें खरीदी गई हैं उन जमीनों का प्लाटिंग के रूप में उपयोग हो रहा है। कई मामले तो ऐसे भी आए हैं कि आदिवासियों के पास खुद की जमीन भी न के बराबर बची है और इनकी जमीनें खरीदने वाले करोड़पति बन गए।

5 साल में यह आया बदलाव

सतना जिले की कृषि संगणना 2010 में अनुसूचित जनजाति के किसानों के पास कुल 29672 हैक्टेयर जमीन रही। लेकिन कृषि संगणना 2015 में यह जमीन घट कर 29527 हो गई। अर्थात 5 साल में 145 हैक्टेयर अर्थात 358 एकड़ से ज्यादा जमीन घट गई। यह आंकड़ा अगले 5 साल में और भी ज्यादा हो सकता है लेकिन 2020 आधार वर्ष की कृषि संगणना पूरी नहीं हो सकी है।

20 साल में 1000 एकड़ से ज्यादा जमीन खो दी

सतना जिले में आदिवासियों ने 2004 से 2023 के बीच 414 हैक्टेयर अर्थात 1023 एकड़ से ज्यादा जमीनें अनुसूचित जनजाति के लोगों ने खो दी। इन लोगों ने अपनी आवश्यकताओं के लिये गैर आदिवासियों को ये जमीनें बेच दीं। कलेक्टर कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार आदिवासियों ने शादी के लिये, बच्चों की पढ़ाई के लिये, अन्य कारोबार या अन्य जरूरतों के लिए अपनी जमीनें गैर आदिवासियों को बेची है। लेकिन जिन लोगों ने इन जमीनों को लिया है उन्होंने इससे करोड़ो कमाए हैं। मसलन मैहर बाईपास में एक विवाह घर से लगी आदिवासियों की जमीन का क्रय विक्रय कर जमीन कारोबारियों ने करोड़ों रुपये की प्लाटिंग कर डाली। जबकि मूल आदिवासी परिवार बमुश्किल अपनी शेष बची जमीन में किसी तरह जीवन यापन कर रहा है। यही हाल मैहर और मझगवां क्षेत्र का है। यहां पर आदिवासियों की जमीनों पर बड़े पैमाने पर खदानों का संचालन किया जा रहा है।

IMAGE CREDIT: patrika

इस तरह बिकीं जमीनें

2004 से अब तक 442 आदिवासियों की 414 हैक्टेयर जमीन गैर आदिवासियों को बिक चुकी है। 2004-05 में 9 आदिवासियों की 8.671 हैक्टेयर, 2005-06 में 36 की 16.175 हैक्टेयर, 2006-07 में 47 की 39.002 हैक्टेयर, 2007-08 में 26 की 24.199 हैक्टेयर, 2008-09 में 20 की24.039 हैक्टेयर, 2009-10 में 91 की 73.997 हैक्टेयर, 2010-11 में 80 की 71.965 हैक्टेयर, 2011-12 में 20 की 20.499 हैक्टेयर, 2012-13 में 17 आदिवासियों की 24.240 हैक्टेयर, 2013-14 में 6 की 20.018 हैक्टेयर, 2014-15 में 5 की 8.197 हैक्टेयर, 2015-16 में 17 की 11.127 हैक्टेयर, 2016-17 में 12 की 13.156 हैक्टेयर, 2017-18 में 9 की 11.893 हैक्टेयर, 2018-19 में 2 की 0.329, 2019-20 में 1 की 0.648 हैक्टेयर, 2020-21 में 4 की 2.035 हैक्टेयर, 2021-22 में 15 की 12.305 हैक्टेयर, 2022-23 में 25 आदिवासियों की 31.742 हैक्टेयर जमीन कलेक्टर की अनुमति से गैर आदिवासियों को बिक चुकी है।

इन सालों में मिली सबसे ज्यादा अनुमति

आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों को बेचने की अनुमति कलेक्टर देते हैं। अनुमति देने के पहले कलेक्टर इसका पर्याप्त आंकलन करते हैं कि क्या वास्तव में जमीन बेचना आदिवासी के लिए जरूरी है। आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा आदिवासियों की जमीन बेचने की अनुमति 2009-10 में 73.997 हैक्टेयर की दी गई। इसके बाद 2010-11 में 71.965, वर्ष 2006-07 में 39.002 हैक्टेयर और 2022-23 में 31.742 हैक्टेयर जमीन बेचने की अनुमति तत्कालीन कलेक्टरों ने दी।