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एमपी के सेठ ने 109 साल पहले अंग्रेजों को दिया था 35 हजार कर्ज, अब ब्रिटेन से सूद समेत वसूलने की तैयारी

MP News : रूठिया परिवार का दावा है कि उनके पूर्वज सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने 1917 में ब्रिटिश हुकूमत को 35000 रुपए कर्ज दिए थे। अब 109 साल बाद परिवार ब्रिटिश क्राउन को कानूनी नोटिस भेजकर उस कर्ज की वसूली की तैयारी में है।
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सीहोर

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Mohammad Faiz Mubarak

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Updated: 25 Feb 2026, 9:02 AM IST

MP News

109 साल पुराना कर्ज वसूलने की तैयारी में एमपी का व्यापारी (Photo Source- Patrika)

MP News : मध्य प्रदेश के सीहोर में इन दिनों एक अनोखी और चौंकाने वाली चर्चा आम है। चर्चा का कारण है यहां का एक व्यापारी, जिसने ब्रिटेन को अपना कर्जदार बता दिया है। आपको जानकर हैरानी होगी, लेकिन शहर के बड़ा बाजार में रहने वाले विवेक रूठिया का दावा है कि, उनके दादा सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने आज से 109 साल पहले 1917 में तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को उसने 35 हजार रुपए कर्ज दिया था।

ये वो दौर था, जब प्रथम विश्व युद्ध के कारण अंग्रेजी शासन आर्थिक दबाव से गुजर रहा था और रियासतों के प्रशासनिक प्रबंधन के लिए धन की जरूरत थी। रूठिया परिवार क अनुसार, ये लेन-देन कोई मौखिक भरोसा नहीं, बल्कि विधिवत लिखित दस्तावेजों के आधार पर हुआ था। यही दस्तावेज अब 109 साल बाद एक नई कानूनी लड़ाई की नींव बनने जा रहे हैं।

कौन थे सेठ जुम्मा लाल रूठिया?

सेठ जुम्मा लाल रूठिया उस समय सीहोर और आसपास के क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यवसायी थे। बताया जाता है कि शहर की बड़ी आबादी उनकी जमीनों पर बसी है। इंदौर और भोपाल तक उनकी संपत्तियों का उल्लेख मिलता है। समाजसेवा में भी उनका विशेष योगदान रहा। परिवार के अनुसार, वे शहर में होने वाले आयोजनों में सहयोग करते थे और उससे होने वाली आय का हिस्सा बीमार व जरूरतमंदों की सहायता के लिए शासन को भेजते थे। उस दौर में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता था।

1917 के 35 हजार, आज कितने करोड़?

रूठिया परिवार का तर्क है कि वर्ष 1917 में 35 हजार रुपए एक अत्यंत बड़ी राशि थी। अगर उस वक्त की सोने की कीमत और मौजूदा दरों की तुलना करें तो ये रकम आज करोड़ों में पहुंच सकती है। विवेक रूठिया के अनुसार, अगर मूलधन पर ब्याज जोड़ा जाए तो यह राशि एक विशाल आर्थिोक दावे में बदल सकती है। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक गणना सामने नहीं आई है, लेकिन परिवार का दावा है कि यह रकम केवल ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

वसीयत में मिले दस्तावेज, अब बने आधार

विवेक रूठिया बताते हैं कि 1937 में सेठ जुम्मा लाल रूठिया का निधन हो गया था। उनके बाद ये दस्तावेज परिवार की वसीयत के रूप में सुरक्षित रखवा दिए गए। बाद में उनके पिता सेठ मानकचंद्र रूठिया को ये कागजात मिले और अब वही दस्तावेज विवेक के पास हैं। इन दस्तावेजों में कथित रूप से ब्रिटिश प्रशासन के साथ हुए लेन-देन का पूरा विवरण दर्ज है। यही कागजात अब ब्रिटेन सरकार को भेजे जाने वाले कानूनी नोटिस का आधार बनाए जाएंगे।

ब्रिटिश क्राउन को नोटिस की तैयारी

विवेक रूठिया ने स्पष्ट किया है कि वे ब्रिटिश क्राउन, यानी वर्तमान यूनाइटेड किंगडम की सरकार को विधिक नोटिस भेजने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई भी संप्रभु राष्ट्र अपने ऐतिहासिक वित्तीय दायित्वों से सैद्धांतिक रूप से मुक्त नहीं हो सकता। हालांकि यह लड़ाई आसान नहीं मानी जा रही। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी कर्ज में समय-सीमा (लिमिटेशन) का प्रश्न अहम होता है। यदि समझौते में पुनर्भुगतान की शर्तें स्पष्ट हैं, तभी मामला मजबूत हो सकता है।

क्या ऐसा कोई कानून है ?

स्थानीय अधिवक्ताओं के अनुसार, इस तरह का नोटिस भेजना संभव है, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि, 1917 के एग्रीमेंट में क्या शर्तें दर्ज थीं इंटरनेशनल कानून के मुताबिक, राज्य उत्तराधिकार और संप्रभु दायित्व जैसे सिद्धांत लागू हो सकते हैं, पर इतने पुराने मामलों में व्यावहारिक अड़चनें भी कम नहीं होतीं। समय-सीमा, साक्ष्य की प्रमाणिकता और न्याय-क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) जैसे मुद्दे इस दावे को जटिल बना सकते हैं। फिर भी, यह मामला कानून से ज्यादा ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व रखता है।

भावनाओं से जुड़ा पूर्वजों का सम्मान

व्यापारी विवेक रूठिया के अनुसार, ये सिर्फ पैसों का मामला नहीं, बल्कि पूर्वजों के सम्मान का भी मामला है। अगर हमारे दादा ने ब्रिटिश शासन की मदद की थी तो उसका हिसाब इतिहास में दर्ज होना चाहिए।' उनका मानना है कि ये प्रयास न सिर्फ एक परिवार के अधिकार की लड़ाई है, बल्कि ये संदेश भी है कि, इतिहास के अधूरे पन्नों को कभी भी पलटा जा सकता है।

शहर में हर तरफ एक ही चर्चा

सीहोर में इस दावे को लेकर लोगों के बीच खासा उत्सुकता देखी जा रही है। कुछ लोग इसे साहसिक कदम बता रहे हैं तो कुछ इसे कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं। शहर के पुराने लोग सेठ जुम्मा लाल रूठिया के योगदान को याद करते हुए कहते हैं कि उनका परिवार हमेशा प्रभावशाली रहा है। वहीं, कई संपत्तियों को लेकर परिवार और कब्जाधारियों के बीच विवाद भी चर्चा में रहे हैं।

क्या इतिहास बदलेगा फैसला?

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ब्रिटेन की सरकार इस नोटिस पर क्या प्रतिक्रिया देती है? क्या 109 साल पुराना दावा कानूनी रूप से स्वीकार्य होगा? या ये सिर्फ एक प्रकार के पुराने दस्तावेज बनकर रह जाएगा? इतिहास के पन्नों से उठी यह कहानी केवल एक कर्ज की नहीं, बल्कि उस दौर की याद दिलाती है जब भारतीय व्यापारी आर्थिक रूप से इतने सक्षम थे कि वे साम्राज्य को भी कर्ज देते थे।

एक सदी बाद भी सवाल जिंदा है

1917 से 2026 तक का सफर लंबा है। एक सदी बीत चुकी, शासन बदल गए, सीमाएं बदल गईं, लेकिन एक परिवार का दावा अब भी जिंदा है। क्या यह कानूनी लड़ाई सफलता तक पहुंचेगी, यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल सीहोर का ये परिवार इतिहास से अपना हिसाब मांगने की तैयारी कर रहा है।

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