
Archeological property scattered here, no saving initiative
शहडोल. प्राचीन इतिहास की कहानी बयां करने वाले अवशेष तो इस जिले में बहुत हैं लेकिन इनमें किसी की रुचि नहीं है। जिसका ही परिणाम है कि यह अवशेष इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। इन्हें सहेजने की दिशा में कोई ठोस कदम कभी नहीं उठाए गए। जिसकी एक वजह यह भी है कि जिस विभाग की जिम्मेदारी इन्हें पहचानने व सहेजने की है वह खुद के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। आलम यह है वर्ष २०१२ से इस विभाग में अधिकारी की कुर्सी खाली पड़ी है। चार कर्मचारियों के भरोसे चल रहा विभाग पूर्व में संग्रहीत की गई कलाकृतियों व प्रतिमाओं की ही देखरेख नहीं कर पा रहा है। जिला मुख्यालय स्थित तीर्थंकर महावीर संग्रहालय एवं उद्यान अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। ऐसे में जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में बिखरे पड़े अवशेषों को कैसे सहेजा जा सकता है यह सोचनीय पहलू हैं।
नगर से लगभग 15 किलोमीटर दूर अंतरा में स्थित कंकाली माता मंदिर एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है। इसके आस-पास के क्षेत्रो में कई पुरातात्विक संपदा बिखरी पड़ी है। साथ ही यहां खुदाई के लिये भी अनुमति मिली थी लेकिन आधी अधुरी ही खुदाई हो पाई है। जानकारों का मानना है कि इस क्षेत्र में खुदाई हो तो और भी कई पुरातन कलाकृतियां, प्रतिमाएं, अभिलेख खुदाई में मिलेंगे।
अब तक नही बन पाया सूर्य मंदिर
प्रदेश का दूसरा सूर्य मंदिर शहडोल जिले की ग्राम पंचायत रोहनियों में स्थित है। यहां भगवान सूर्यदेव की प्राचीन काल की प्रतिमा स्थापित है। दु:खद पहलू यह है कि इस प्रतिमा अभी भी खुले आसमान के नीचे ही रखी हुई है। ग्रामीणों द्वारा इसे व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया है लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल नही की गई है। पूर्व में मंदिर बनाए जाने के लिये जमीन आवंटित की गई थी लेकिन वन विभाग के रोड़े की वजह से यह मंदिर भी नही बन पाया। जिसके बाद अभी कोई ठोस पहल नही की गई।
यहां बिखरे पड़े हैं अवशेष
जनपद पंचायत बुढ़ार अंतर्गत गिरवर धाम में भी कई प्राचीन अवशेष बिखरे पड़े हैं। ऐसी मान्यता हैं कि यहां प्राचीन मंदिर था जो पूर्ण रूप से जीर्ण शीर्ण हो गया था। जिसके बाद स्थानीय समाज सेवी व ग्रामीणों के सहयोग से इसे व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया। इस स्थान पर भव्य मंदिर निर्माण कराया जा रहा है। जिसके लिए खुदाई की गई तो कई अवशेष मिले हैं। जिन्हें देखकर ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि यह कलाकृतियां व प्रतिमाएं कल्चुरी काल की हैं हालांकि अभी तक इसकी किसी ने पुष्टि नहीं की है। फिलहाल समाज सेवी व ग्रामीणों की वजह से यह अवशेष सुरक्षित तो हैं लेकिन अभी भी इनका अस्तित्व खतरे में हैं। इसके अलावा जैतपुर कुनुक नदी के आस-पास प्रचुर मात्रा में पुराने अभिलेख, कलाकृतियां बिखरी पड़ी हैं।
Published on:
20 Feb 2018, 11:44 AM IST
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