7 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

मध्यप्रदेश का ऐसा गांव, जहां हर दूसरे घर में मिल जाएंगे नेशनल फुटबॉल प्लेयर

मिनी ब्राजील के नाम से होती है इस गांव की पहचान, सच्चाई जान आप भी रह जाओगे हैरान

4 min read
Google source verification
MP village yahan har dusre ghar men hain national football player

मध्यप्रदेश का ऐसा गांव, जहां हर दूसरे घर में मिल जाएंगे नेशनल फुटबॉल प्लेयर

शहडोल- दुनिया में इन दिनों फीफा वल्र्ड कप का फीवर छाया हुआ है, इस वल्र्ड कप में भारत नहीं खेल रहा है, क्योंकि इसके लिए भारतीय फुटबॉल टीम क्वालीफाई ही नहीं कर पाती है, ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या भारत में अच्छे फुटबॉल प्लेयर नहीं है, जो टीम को जीत दिला सकें। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, इस खबर को पढऩे के बाद तो आपकी भी सोच बदल जाएगी कि भारत देश में फुटबॉल में टैलेंट की कमी नहीं है, बस इन्हें तराशने की जरूरत है, अच्छी सुविधाएं मुहैय्या कराने की जरूरत है।

आदिवासी अंचल के जिला मुख्यालय शहडोल से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है एक छोटा सा गांव विचारपुर, वैसे तो जिला मुख्यालय से बहुत करीब है, लेकिन यहां के स्पोर्ट्स टैलेंट से लगता है लोग ज्यादा वाकिफ नहीं हैं, तभी तो आज भी फुटबॉल में इतने नेशनल खेलने के बाद भी ये खिलाड़ी लोगों के नजर में नहीं आए, यहां एक से एक नेशनल फुटबॉल प्लेयर हैं, लेकिन आज भी ये खिलाड़ी एक नौकरी के लिए मोहताज हैं।

यहां के अधिकांश घरों में नेशनल फुटबॉल प्लेयर

देखा जाए तो विचारपुर गांव में लगभग 6 सौ से 7 सौ के करीब की जनसंख्या है, छोटा सा गांव है, लेकिन यहां टैलेंट की कमी नहीं है, आसपास के एरिया में इस गांव को मिनी ब्राजील के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस गांव में एक से बढ़कर फुटबॉल के क्रेजी खिलाड़ी हैं। यहां के युवाओं में फुटबॉल टैलेंट को देखने के लिए बाहर से भी लोग आ चुके हैं। देखा जाए तो यहां आपको गली मोहल्ले में फुटबॉल के नेशनल प्लेयर मिल जाएंगे। इस गांव के अधिकांश आदिवासी समुदाय के घरों में आपको फुटबॉल के नेशनल प्लेयर मिल जाएंगे। जिनमें से कई खिलाड़ी तो एक से ज्यादा नेशनल भी खेल चुके हैं।

आदिवासी समुदाय के हैं ये सभी खिलाड़ी

विचारपुर गांव में फुटबॉल में नेशनल खेलने वाले अधिकतर खिलाड़ी आदिवासी समुदाय के हैं, जिसमें बैगा, कोल, गोंड़, हरिजन हैं। फिर भी आज इनके पास नौकरी नहीं है, और इसीलिए अपने परिवार का पेट पालने के लिए इनमें से ज्यादातर युवा फुटबॉल को दरकिनार कर कोई मजदूरी कर रहा , कोई कपड़े की दुकान में काम कर रहा, कोई फर्नीचर की दुकान में काम कर रहा। फुटबॉल में नेशनल तो खेल लिया,
लेकिन इन्हें अब आगे का रास्ता ही नहीं पता कि करना क्या है, इन्हें कोई गाइडेंस देने वाला ही नहीं।

अब हताश हो चुके हैं- नेशनल फुटबॉल प्लेयर

विचारपुर गांव के ही रहने वाले अनिल सिंह गोंड़ बताते हैं कि वो भी फुटबॉल में एक नेशनल खेल चुके हैं, एक ऑल इंडिया खेल चुके हैं, रेलवे में नौकरी जरूर कर रहे हैं, लेकिन इस खेल की वजह से नहीं बल्कि बकायदे कंपटीशन फेस करके वो नौकरी कर रहे हैं, अनिल बताते हैं कि उनके परिवार में ही भाई बहन मिलाकर 6 नेशनल प्लेयर हैं। बहनें तो एक से ज्यादा नेशनल खेल चुकी हैं, लेकिन आज भी उनके पास नौकरी नहीं है, और न ही उनको कोई मार्गदर्शन करने वाला है कि इस खेल में अब आगे कैसे बढ़ा जाए, अनिल युवाओं के बीच खेल में आज भी सक्रिय रहते हैं और वो बताते हैं कि गांव के नेशनल प्लेयर की हालत देखकर अब तो स्पोर्ट्स से ही हताशा होने लगी है, अब तो आने वाली पीढ़ी को भी स्पोर्ट्स के लिए मोटिवेट करने का मन नहीं करता, क्योंकि नेशनल तक तो वो पहुंच जाते हैं, लेकिन फिर वहां से उनके रास्ते ही बंद हो जाते हैं, जबकि अगर इन खिलाडिय़ों को सही मार्गदर्शन मिले, सुविधाएं मिलें, तो यहीं से फुटबॉल के मेस्सी और रोनाल्डो निकलने लगेंगे।

पहले मौका नहीं मिला, तो अब क्या मिलेगा ?

गांव के बाहर रास्ते में ही 22 साल के युवा लड़के से मुलाकात होती है, साइकिल पर राकेश कोल नाम का ये युवा तेजी के साथ अपने काम पर जा रहा था, अचानक से मुझे बताया जाता है कि ये लड़का भी सात नेशनल खेल चुका है, अंडर-16 स्कूल इंडिया खेल चुका है। एक फुर्तीला स्ट्राइकर है, लेकिन घर की स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से अब वो एक फर्नीचर की दुकान पर काम करता है। 12वीं तक की पढ़ाई की है। जब राकेश कोल से उनके फुटबॉल खेलने के बारे में पूंछा तो कहते हैं पहले तो मौका मिला नहीं अब क्या मिलेगा, अब तो काम में जाना पड़ता है, खेलने का उतना वक्त ही कहां मिल पाता है।

अब तो खेल छूट गया - नरेश कुंण्डे, नेशनल फुटबॉल प्लेयर

नरेश कुंण्डे जिनकी उम्र 27 साल की है, और वो बड़े ही हताश मन से बताते हैं कि उन्होंने फुटबॉल में 3 नेशनल और 3 युनिवर्सिटी खेला है, पढ़ाई ग्रेजुएशन में ही छोड़ दी, क्योंकि घर की जिम्मेदारी आ गई। अब मजदूरी करते हैं, जो भी काम मिल गया वो कर लेते हैं।

लड़कियां भी नहीं पीछे

इस गांव की खास बात ये भी है कि फुटबॉल के इस खेल में यहां की लड़कियां भी नहीं हैं पीछे, फुटबॉल में कई लड़कियां तो कई नेशनल भी खेल चुकी हैं, यशोदा सिंह जो कि 5 नेशनल खेल चुकी हैं बड़े ही हताश मन से कहती हैं कि फुटबॉल तो उनका फेवरेट खेल है, और वो आगे भी खेलेंगी, लेकिन दुखी मन से कहती हैं कि आगे तो उनका मार्गदर्शन करने वाला ही कोई नहीं है, और न ही इससे कोई नौकरी मिलने वाली है।

क्योंकि अपने गांव में बाकी के युवाओं का फ्यूचर देख ही रहे हैं, जो कई नेशनल खेल चुके हैं, लेकिन आज भी उनकी कोई पहचान नहीं है, और न ही उनके पास कोई नौकरी है। यशोदा के साथ उनकी बहन सीता सिंह, और गीता सिंह भी मौजूद थीं जो फुटबॉल में नेशनल खेल चुकी हैं।

जैसे ही कोई अवसर आएगा, मैं प्रयास करूंगा

जिला खेल एवं युवा कल्याण अधिकारी शैलेंन्द्र सिंह जाट के मुताबिक मैं खुद उन खिलाडिय़ों से मिला हूं, उनमें से कई खिलाडिय़ों का शैक्षणिक स्तर काफी कमजोर है। जिस वजह से नौकरी मिलने में दिक्कत हो रही है। जो खिलाड़ी पढ़े लिखे हैं मैं उनसे सतत संपर्क में हूं और जैसे ही कोई ऐसा अवसर मिलता है तो मैं खुद प्रयास करूंगा कि उनका चयन हो।