
शाहजहांपुर की 'जूता मार' होली, चौंकना लाजिमी है
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
शाहजहांपुर. यूपी के कई शहरों से होली आई रे...... की गूंज सुनाई देने लगी है। मथुरा, अयोध्या और काशी में तो होली की तैयारियां एक हफ्ते से शुरू हो चुकी हैं। यूपी में हर इलाके की अपनी-अपनी होली हैं और वो सभी विश्व प्रसिद्ध हैं। जैसे मथुरा की लठ्ठमार होली और काशी के मसाने की होली। वैसे तो होली खेले रघुवीरा और बुंदेलखंड की होली भी किसी से कम नहीं है। पर कभी 'जूता मार होली' का नाम सुना है। चौंकिए नहीं। करीब 190 वर्ष पुरानी यह होली शाहजहांपुर जिले की पहचान है। फागुन के महीने के इंतजार में शाहजहांपुर के होरियार व्याकुल रहते हैं। कब होली आए और 'लाट साहब' Laat Sahab को जूते से मारे और भैंसा गाड़ी पर उनका जुलूस पूरे शहर में निकलें। 'जूता मार होली' की तैयारियां में जहां जिला प्रशासन जुटा हुआ है वहीं पुलिस प्रशासन इसकी सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की रणनीति बना रहा है।
दिल्ली से आएंगे 'लाट साहब' :- 'जूता मार होली' और 'लाट साहब' दोनों को लेकर एक जिज्ञास जागृत हो गई होगी। इस बारे में स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि, 'यहां होली वाले दिन भैंसा गाड़ी में 'लाट साहब' का जुलूस बड़े ही गाजे-बाजे के साथ निकलता है। जुलूस में सभी होरियार, लाट साहब की जय बोलते हुए उन्हें जूतों से मारते हैं।' आयोजकों ने बताया है कि, इस बार 'लाट साहब' दिल्ली से आएंगे जबकि पिछली बार 'लाट साहब' रामपुर से लाए गए थे। हर वर्ष 'लाट साहब' अलग-अलग शहर से आते है।
स्वागत में निकाला जुलूस बन गई परंपरा :- लाट साहब कौन थे इनका होली क्या सम्बंध है इस पर डाक्टर खुराना ने बताया कि, शाहजहांपुर शहर की स्थापना करने वाले नवाब बहादुर खान के वंश के आखिरी शासक नवाब अब्दुल्ला खान पारिवारिक लड़ाई से ऊब कर फर्रुखाबाद चले गए थे। वर्ष 1729 में 21 साल की उम्र में शाहजहांपुर लौटे। नवाब अब्दुल्ला खान हिंदू-मुसलमानों के बड़े प्रिय थे। जब लौटे तो होली का अवसर था। सबने नवाब साहब के संग होली खेली। और ऊंट पर बैठाकर उनका एक जुलूस निकाला, बाद में यह परंपरा बन गई।
अंग्रेजों को हिंदू मुस्लिम सौहार्द रास नहीं आया :- डाक्टर खुराना ने आगे बताया कि, वर्ष 1857 तक हिंदू-मुस्लिम दोनों साथ-साथ होली धूमधाम से मनाते थे। पर जब इसकी सूचना अंग्रेजों को हुई तो उनको हिंदू मुस्लिम सौहार्द रास नहीं आया। इसके बाद वर्ष 1858 में बरेली के सैन्य शासक के सैन्य कमांडर मरदान अली खान ने शाहजहांपुर में हिंदुओं पर हमला कर दिया। जिसमें तमाम हिंदू मुसलमान मारे गए। शहर में सांप्रदायिक तनाव हो गया। यहीं अंग्रेजों की नीति थी।
नाम से बदल कर 'लाट साहब' रखा :- डाक्टर खुराना ने बताया कि साल 1947 में आजादी के बाद शाहजहांपुर के गुस्साए लोगों ने जुलूस का नाम नवाब साहब के नाम से बदल कर 'लाट साहब का जुलूस' कर दिया और तब से यह लाट साहब के नाम से जाना जाने लगा। यह जुलूस चौक कोतवाली स्थित फूलमती देवी मंदिर से निकल पुन यही समाप्त हो जाता है।
सुरक्षा व्यवस्था मुस्तैद :- शाहजहांपुर पुलिस अधीक्षक एस आनंद ने बताया कि, होली पर लाट साहब के छोटे और बड़े कई जुलूस निकलते हैं। पुलिस प्रशासन की तैयारियां पूरी हैं। दो ड्रोन कैमरों से इन जुलूसों पर नजर रखी जाएगी। इसके अलावा पांच पुलिस क्षेत्राधिकारी, 30 थाना प्रभारी, 150 उपनिरीक्षक, 900 सिपाही के साथ दो कंपनी पीएसी, दो कंपनी आरपीएफ मुस्तैद रहेंगी।
Published on:
22 Mar 2021 04:41 pm
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