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motivational story : बचपन में पैरों ने साथ छोड़ा तो ‘हौसले’ के कारण लगाई दौड़

motivational story in hindi: आज बच्चों को खड़ा कर रहे अपने पैरों पर, दिव्यांग शिक्षक ज्ञानसिंह राजपूत प्रस्तुत कर रहे मिसाल

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शाजापुर. जब पैदा हुआ और पैरों पर खड़ा होने की बारी आई तो पैरों ने साथ छोड़ दिया, लगा जिंदगी में कैसे आगे बढ़ पाएंगे, लेकिन परिवार ने हौसला दिया और हिम्मत टूटने नहीं दी। परिणाम यह हुआ कि गांव में स्कूल पूरा किया और फिर जिला मुख्यालय से कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। 2000 में संविदा शिक्षक के रूप में काम शुरू किया 2001 में पदस्थापना मिली। धीरे-धीरे करके माध्यमिक शिक्षक के रूप में सेवाएं देते हुए बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं।

हम बात कर रहे हैं एकीकृत शाला शासकीय हाई स्कूल गोदना के शिक्षक ज्ञानसिंह राजपूत की। नाम की तरह शिक्षक द्वारा बच्चों को ज्ञान देकर न सिर्फ शिक्षित किया जा रहा है, बल्कि अच्छे भविष्य के लिए भी तैयार कर रहे हैं। शिक्षक दिवस अपने संघर्ष को साझा करते हुए शिक्षक ने बताया वे मूलत: मोहन बड़ोदिया तहसील के ग्राम मदाना के मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। बचपन में दिव्यांगता के बारे में पता लग गया था। इसके बाद भी परिवार ने हौंसला देकर आगे बढ़ाया। इसके चलते आज मैं यहां तक पहुंच पाया हूं। उन्होंने कहा कि बच्चें जब नाम रोशन करते है तो बहुत अच्छी अनुभूति होती है। बच्चों को दौड़ता हुआ देखकर कभी यह अहसास भी नहीं होता है कि मैं शारिरिक रूप से अक्षम हूं। बच्चों की खुशी व मुस्कुराहट उत्साहित करती है। जिससे मैं और बेहतर ढंग से बच्चों को पढ़ाने का प्रयत्न करता हूं।

पहले परिवार के सदस्य लाते थे गांव तक, अब स्वयं आने लगे-पैरों से दिव्यांग होने के कारण विद्यालय तक आना-जाना बहुत परेशानी भरा था। शुरुआती दौर में परिवार के सदस्य लेकर आते थे, लेकिन बाद में ट्राइसिकल से आने लगा। ग्राम मदाना से विद्यालय करीब 8 किमी दूर हैं। ऐसे में प्रतिदिन स्कूल पहुंचकर बच्चों को पढ़ाने के लिए पहले काफी संघर्ष भी करना पड़ता था। पहले आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। ऐसे में बारिश, सर्दी में अपडाउन करने में परेशानी बढ़ जाती थी। हालांकि अब एक बाइक को लेकर उसे अपने हिसाब से मोडिफाइड करवा लिया है। इससे यहां तक आना-जाना सरल हो गया है।

शिक्षक बच्चों में तो लोकप्रिय हैं वहीं स्टाफ भी मुरीद है। विद्यार्थियों का कहना है कि शिक्षक द्वारा बहुत ही सहज तरीके से पढ़ाया जाता है। जब कभी कुछ समझ नहीं आया और उनसे दोबारा पूछने पर भी वे बहुत ही शालिनता से समस्या का समाधान करते हुए समझाते है। वहीं स्टॉफ सदस्य भी शिक्षक राजपूत के इस हौंसले का लोहा मानते हुए उनकी कर्तव्यनिष्ठा के लिए सराहना करते हैं।