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अन्नपूर्णा बनीं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, अपनी कमाई गर्भवतियों पर कर रहीं खर्च

शिवपुरी जिले के महिला बाल विकास विभाग में कार्यरत आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं ममता की मिसाल बन रही हैं। शिशुओं, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मां का प्यार और दुलार देने में ये कोई कमी नहीं छोड़ रहीं। स्थिति ये है कि जरूरत पडऩे पर गर्भवतियों और बच्चों की देखरेख के लिए वे अपनी जेब से पैसे खर्च करने में भी नहीं हिचक रहीं... हालांकि वे वेतन न मिल पाने के कारण वे खुद आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं, लेकिन ममता का उनका जज्बा देखते बनता है, जरूर पढ़ें पत्रिका की ये रिपोर्ट...

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शिवपुरी जिले के महिला बाल विकास विभाग में कार्यरत आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिकाओं को पिछले तीन माह से मानदेय नहीं मिला। आर्थिक संकट से जूझ रहीं कार्यकर्ता-सहायिका को अब पोषण आहार अपने केंद्र तक ले जाने के लिए ऑटो का किराया भी अपनी जेब से देना पड़ रहा है। पहले आदिवासी महिलाओं की सब्जी-भाजी का पैसा बंद हुआ, फिर प्रसूति सहायता राशि मिलना बंद हुई और अब महिला बाल विकास विभाग पर भी आर्थिक संकट गहरा गया।

महत्वपूर्ण बात यह है कि विभाग की कार्यकर्ता व सहायिका ही नहीं बल्कि सीडीपीओ को भी वेतन नहीं मिला। शिवपुरी जिले के महिला बाल विकास विभाग में पदस्थ 4816 कार्यकर्ता व सहायिका को पिछले तीन माह से मानदेय नहीं मिला। जब उन्होंने विभाग में बात की तो उन्हें एक ही जवाब मिलता है कि बजट नहीं है। बीते तीन माह से मानदेय न मिलने की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति गड़बड़ा चुकी है। इन महिलाकर्मियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ उस समय और बढ़ गया, जब आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण आहार के कट्टे पहुंचाने वाले वाहन चालक ने भी अपनी सेवाएं बंद कर दीं। शिवपुरी शहर के केंद्रों पर जाने वाले पोषण आहार के कट्टों को थोक सब्जी मंडी के पास स्थित आंगनबाड़ी केंद्र के भवन में भर दिए हैं। यहां से कार्यकर्ता व सहायिका किराए का ऑटो करके पोषण आहार के कट्टे अपने केंद्रों तक ले जा रही हैं।

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कलेक्टर ने भी लिखा था पत्र

मानदेय न मिलने से परेशान कार्यकर्ता व सहयिका ने जब अपनी पीड़ा कलेक्टर रङ्क्षवद्र कुमार चौधरी को बताई तो कलेक्टर ने उनका मानदेय दिए जाने के लिए बीते 16 जनवरी को आयुक्त महिला बाल विकास विभाग भोपाल को लिखा। जिसमें उन्होंने उल्लेख किया कि बजट आबंटन न होने से कार्यकर्ता व सहायिका को नवंबर-दिसंबर 2023 का मानदेय भुगतान अभी तक नहीं हुआ है। जबकि मानदेय ही उनके जीवन का सहारा है, तथा वो भी न मिलने की वजह से वो आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है। कलेक्टर ने दो माह का मानदेय 6,09,77,555 रुपए की राशि का बजट आबंटन करने की मांग की थी। इस पत्र को गए हुए भी 12 दिन हो गए, लेकिन अभी तक कार्यकर्ता व सहायिका का मानदेय नहीं आया।

तीन माह का 14 करोड़ से अधिक बकाया

शिवपुरी जिले में कुल 2408 आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जिसमें प्रत्येक में कार्यकर्ता व सहायिका पदस्थ होने की वजह से उनकी संख्या 4816 होती है। इनमें कार्यकर्ता को हर माह 13 हजार रुपए व सहायिका को 6500 रुपए मानदेय मिलता है। कार्यकर्ताओं का हर माह का मानदेय 3,13,04,000 रुपए तथा सहायिका का मानदेय 1,56,52,000 रुपए होता है। तीन माह का बकाया मानदेय अब 14,08,68,000 रुपए होता है। यह तो सिर्फ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिका का मानदेय है, जबकि सीडीपीओ सहित अन्य स्टाफ को भी तीन माह से वेतन नहीं मिला।

महिला बाल विकास विभाग में कार्यरत कर्मचारी-अधिकारियों सहित कार्यकर्ता व सहायिका के मानदेय का भुगतान इसलिए नहीं हो पा रहा, क्योंकि शासन के पास बजट नहीं है। यह स्थिति केवल शिवपुरी की ही नहीं बल्कि पूरे स्टेट की है।

- महेंद्र सिंह अंब, प्रभारी डीपीओ, महिला बाल विकास विभाग

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