
सीकर. राजस्थान के सीकर में प्रशासन ने भले ही एसके अस्पताल की ट्रोमा यूनिट को शुरू करने के निर्देश दिए हो लेकिन अभी हालात जस के तस है। ट्रोमा यूनिट के ओटी पर ताले लटके रहते हैं। कहने को ट्रोमा यूनिट में ट्रॉली मैन लगाए हैं लेकिन पिछले दो माह से अभी भी परिजनो को ही स्ट्रेचर लेकर वार्ड तक अपने मरीज को पहुंचाना पड़ रहा है। रही सही कसर जयपुर रैफर के दौरान ट्रोमा यूनिट से नर्सिंग को भेज देने से हो जाती है। एेसे में मरीजों की संख्या बढऩे के साथ ही ट्रोमा की व्यवस्था पटरी से ही उतर जाती है। मिनटों में हो सकने वाले उपचार के लिए कई घंटे तक लग जाते हैं।
यहां भी लगती है देरी
अस्पताल में आपातकाल के समय मरीज ट्रोमा सेंटर में ही इलाज के लिए आते हैं। इलाज के दौरान सर्जन या फिजिशियन को ऑनकॉल बुलाने से डायरी भरनी होती है। डायरी भरने के बाद एम्बुलेंस चालक संबंधित चिकित्सक को फोन करता और उसके घर जाकर लेकर आता है। इसके बाद ही मरीज की जांच व सटीक इलाज शुरू होता है। इस पूरी प्रक्रिया में 30 से 40 मिनट तक खर्च हो जाते हैं।
इसलिए कर देते हैं रैफर
ट्रोमा सेंटर में रात को चिकित्सक नहीं मिलते हैं। ऐसे में रात में नर्सिंग स्टॉफ फोन पर ही संबंधित चिकित्सक से सलाह ले लेते हैं। जिसमें ज्यादातर मामलों में चिकित्सक मरीजों को जयपुर रैफर करने की सलाह ही देते हैं। यही कारण है कि रात्रि में ट्रोमा सेंटर में आने वाले करीब 25 फीसदी मरीजों को जयपुर या अन्य जगह रैफर कर दिया जाता है। रात्रि के समय आने वाले मरीजों में अधिकांश दुर्घटना या प्वाइजन के मामले होते हैं। नर्सिंग स्टॉफ की माने तो रात्रि में ड्यूटी देने वाले फिजिशियन या सर्जन हो तो ही ट्रोमा सेंटर की व्यवस्था पटरी पर आ सकती है।
Published on:
20 Aug 2018 04:24 pm
