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Rajasthan: ‘अफसर-नेताओं के बच्चे भेजे जाएं सरकारी स्कूल’, मंत्री दिलावर के बयान के बाद मामला गरमाया

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर द्वारा शिक्षकों के बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजे जाने वाले बयान का मामला बढ़ता जा रहा है। शिक्षक संगठनों ने यह नियम अफसर और नेताओं के बच्चों के लिए अनिवार्य करने की मांग की है।

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सीकर

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Kamal Mishra

Mar 09, 2026

Madan Dilawar

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर (फोटो-पत्रिका)

सीकर। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने हाल ही में शिक्षकों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की नसीहत दी थी, जिसके बाद शिक्षा जगत में इस मसले पर बहस तेज हो गई है। इसे सरकारी स्कूलों में नामांकन व शिक्षण व्यवस्था के लिए फायदेमंद माना जा रहा है। खुद शिक्षक संगठन भी इसके लिए तैयार हैं। पर उनकी मांग है कि नियम सभी सरकारी विभागों व जनप्रतिनिधियों पर लागू हो तो सरकारी स्कूलों व सामाजिक समरसता की नींव ज्यादा मजबूत होगी। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों में बेहतर सुविधाएं, पर्याप्त शिक्षक और प्रभावी निगरानी भी जरूरी है।

शिक्षक संगठनों व शिक्षाविदों का कहना है कि यदि सरकारी वेतन, मानदेय या पेंशन पाने वाले सभी जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों व कर्मचारियों के बच्चों का प्रवेश सरकारी स्कूलों में अनिवार्य करें तो सरकारी स्कूलों का स्तर अपने आप सुधर जाएगा। क्योंकि इससे सरकारी स्कूलों का नामांकन तो बढ़ेगा ही, अपने बच्चों की शिक्षा की चिंता में सरकारी व्यवस्था भी स्कूलों के विकास और निगरानी पर ज्यादा ध्यान देगी।

विद्यालयों में होगा सुधार

अधिकारी व जनप्रतिनिधि स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य बनेंगे तो उससे भी शिक्षण और संसाधनों पर सकारात्मक असर होगा। सभी वर्गों के बच्चे साथ पढ़ेंगे तो सामाजिक समरसता भी बढ़ेगी।

इलाहबाद हाईकोर्ट दे चुका है सुझाव

सरकारी कर्मियों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा तमिलनाडू व केरल सरकार भी कभी मंशा जता चुकी है। 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी शिक्षा में सुधार के लिए सरकारी कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों और न्यायपालिका के कर्मचारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का सुझाव दिया था। कोर्ट का तर्क था कि अगर अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजेंगे तो वे स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने के लिए ज्यादा गंभीर होंगे।

दो राज्य जता चुके हैं मंशा

इसी तरह 2018 में कर्नाटक सरकार के शिक्षा मंत्री एन महेश ने भी इसे लागू करने की मंशा जाहिर की थी। तमिलनाडु में भी 2017 में सरकारी स्कूलों के कर्मचारियों के लिए ये नियम लागू करने पर मंथन हुआ था। हालांकि, तीनों ही जगह ये लागू नहीं हो पाया।

इनका कहना है-

शिक्षकों के बच्चों के सरकारी स्कूलों में प्रवेश की नीति हमें स्वीकार है, लेकिन ये नियम सभी सरकारी विभागों व जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होना चाहिए। इससे स्कूलों का स्तर भी सुधरेगा और हर वर्ग के बच्चों के प्रवेश से सामाजिक समरसता का भाव भी बढ़ेगा। -उपेंद्र शर्मा, प्रदेश महामंत्री, राजस्थान शिक्षक संघ शेखावत

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के बच्चों के प्रवेश की शिक्षा मंत्री की बात स्वागत योग्य है। ये नियम सभी राजनेताओं व सरकारी विभागीय कर्मचारियों पर अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए। इससे सरकारी शिक्षण व्यवस्था मजबूत होगी और अभिभावकों को शिक्षा के बड़े खर्च से भी राहत मिलेगी। -बसन्तकुमार ज्याणी, प्रदेश प्रवक्ता, राजस्थान वरिष्ठ शिक्षक संघ रेस्टा

टॉपिक एक्सपर्ट ने क्या कहा?

सभी जनप्रतिनिधियों व सरकारी कर्मचारियों के बच्चों का प्रवेश सरकारी स्कूलों में अनिवार्य करना चाहिए। साथ ही स्कूलों के आकर्षक भवनों, पर्याप्त शिक्षक, परिणाम आधारित पदोन्नति, मॉनिटरिंग, आधुनिक शिक्षण प्रणाली व आवश्यक सभी साधन- संसाधनों पर ध्यान दें तो सरकारी स्कूलों का नामांकन व शैक्षिक स्तर में आमूलचूल परिवर्तन हो सकता है। सरकार को हर पंचायत में पर्याप्त स्टाफ सहित तीनों संकायों वाले 1 से 12 तक के स्कूलों का संचालन भी सुनिश्चित करना चाहिए। क्योंकि शिक्षक व इच्छित संकाय नहीं मिलने पर भी विद्यार्थियों का सरकारी स्कूलों से पलायन बढ़ रहा है। -रामचंद्र पिलानियां, सेवानिवृत मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी, सीकर।