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शान-ए-वतन: इस जांबाज नायक ने चंद घंटे की फायरिंग में ही पाक सैनिकों को सुलाया मौत की नींद

सीकर के डाबला निवासी जयराम (41) को अपनी बहादुरी के लिए देश के तीसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार वीरचक्र से सम्मानित किया गया
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naik jairam singh

शान-ए-वतन: इस जांबाज नायक ने चंद घंटे की फायरिंग में ही पाक सैनिकों को सुलाया मौत की नींद

सीकर. वर्ष 1999 के करगिल युद्ध के दौरान राजपूताना राइफल्स के नायक जयराम सिंह ने ऐसी जांबाजी दिखाई कि पाकिस्तानी सेना थर्रा उठी। चंद घंटे की फायरिंग में ही जयराम ने पाक सैनिकों को मौत की नींद तो सुलाया ही, जम्मू-कश्मीर के द्रास सेक्टर में लोन हिल को दुश्मनों के कब्जे से मुक्त भी कराया। जज्बा ऐसा कि घुटने से गोली आर-पार होने के बावजूद जयराम को घंटों तक पता नहीं चला कि वह घायल हैं। सीकर के डाबला निवासी जयराम (41) को अपनी बहादुरी के लिए देश के तीसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार वीरचक्र से सम्मानित किया गया। हालांकि इसके बाद नि:शक्त जयराम को सेना से रिटायर कर दिया गया। राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में उन्होंने बताया, करगिल युद्ध के दौरान तोलोलिंग पर कब्जा करने के बाद हमारी पलटन नीचे उतर रही थी तब सभी खुश थे। हालांकि साथियों को अपनी आंखों के सामने खोने की पीड़ा भी थी। नीचे उतरे तो पलटन को पुन: द्रास सेक्टर में जाने के आदेश हुए। वहां पाकिस्तानी सैनिकों ने लोन हिल पर कब्जा जमा लिया था।

वीर चक्र प्राप्त जयराम ने साझा की करगिल युद्ध के दौरान दिखाई बहादुरी
मैं अकेला ही बचाजयराम ने बताया, द्रास में हमें रात के अंधेरे में 5 किमी तक पहाड़ों पर सीधी चढ़ाई चढऩी थी। हमारी पलटन में 7 जवान थे। हम उस मोड़ पर पहुंच गए जहां से चढ़ाई एकदम खड़ी और रास्ता संकरा था। प्लाटून कमांडर ठिकाने से महज 2 कदम दूर थे तभी दुश्मन ने फायरिंग शुरू कर दी। अगले ही पल देखा कि सभी साथी शहीद हो गए। मैं अकेला ही बचा था और ऑपरेशन की पूरी जिम्मेदारी मुझ पर थी। फिर क्या था, खुद को पत्थरों की ओट में छुपाया और गोलियां बरसाने लगा। दुश्मनों के एक के बाद शव गिरते चले गए। फायरिंग रुकी तो मैं ऊपर पहुंचा, वहां से दुश्मन का सफाया हो चुका था। हमें कवर देने आ रही दूसरी टुकड़ी को मैंने पोस्ट सौंपी।