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जब लगान के खिलाफ सीकर के किसानों ने लगा दी थी जान की बाजी, इतिहास में आज भी दर्ज है संघर्ष की दास्तां

25 अप्रैल 1935! सीकर के इतिहास का एक अहम दिन! अंग्रेजों की गुलामियत का मौसम! ऐसे में सीकर के पास कूदन गांव में सत्ता के खिलाफ एक आक्रोश पनप रहा था।
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जब लगान के खिलाफ सीकर के किसानों ने लगा दी थी जान की बाजी, इतिहास में आज भी दर्ज है संघर्ष की दास्तां

जब लगान के खिलाफ सीकर के किसानों ने लगा दी थी जान की बाजी, आज भी इतिहास में दर्ज संघर्ष की अनोखी दास्तां

सीकर.

25 अप्रैल 1935! सीकर Sikar के इतिहास History का एक अहम दिन! अंग्रेजों British की गुलामियत का मौसम! ऐसे में सीकर के पास कूदन गांव में सत्ता के खिलाफ एक आक्रोश पनप रहा था। उस दिन सुबह तीन बजे ही लगान Fine वसूली के लिए 16 घुड़सवार सीकर से कूदन के लिए रवाना हुए और 6.15 बजे तक सीकर पुलिस के इंचार्ज मेजर मलिक मुहम्मद हुसैन ने भी राजस्व अधिकारी रघुनन्दन और 50 अन्य पुलिसकर्मियों के साथ पहुंचकर गांव के बाहर दक्षिणी हिस्से में पड़ाव डाल दिया। इधर, तीन दिन पहले पड़ौसी भैंरूपुरा गांव में जिस बर्बर तरीके से लगान वसूल किया गया था उसके बाद 21 गांवों के किसान भी यहां आर-पार की लड़ाई के लिए कूदन में संगठित मुकाबला करने के लिए तैयार हो चुके थे। सात बजे जब लगान वसूली दल के लिए कुछ भिश्ती गांव के कुए से पानी लाने पहुंचे तो लाठियों व फरसों से लैस 70-80 किसानों ने उन्हें पानी नहीं भरने दिया। मेजर मलिक मुहम्मद ने वार्ता के लिए गांव के दो चौधरियों कालूराम और गणेशराम को पड़ाव स्थल पर आमंत्रित किया किन्तु उन्होंने आने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि वार्ता करनी होगी तो मेजर साहब खुद ही गांव में आ जायेंगे। मजबूरन मेजर को वार्ता के लिए गांव की धर्मशाला में जाना पड़ा जहां किसानों ने समय व्यतीत करने की दृष्टि से काफी समय तक उसे वार्ता में उलझाये रखा ताकि पड़ौसी गांवों के किसान उनकी सहायतार्थ पहुंच सकें।
किसानों Farmers ने मेजर को लगान वसूली में मदद करने का आश्वासन देकर वापिस पड़ाव स्थल भेज दिया और इसके बाद दो सरकारी कारिंदों तहसील सवार रूकनुद्दीन एवं भंवरसिंह कांस्टेबल पर हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया। इस समय तक अजीतपुरा, गोठड़ा और अन्य स्थानीय गांवों के हथियारबंद किसान भी गांव में पहुंच चुके थे। इसके बाद किसानों की संगठित भीड़ ने पुलिस के पड़ाव स्थल पर हमला कर दिया। इस भयंकर संघर्ष के दौरान चार किसान चेतराम, टीकूराम, तुलछाराम व आषाराम शहीद हुए। मेजर मलिक मुहम्मद हुसैन ने अपनी सरकारी रिपोर्ट में लिखा कि संघर्ष से पहले हमने किसानों को धमकाने के लिए तीन हवाई फायर किये थे किन्तु वे यह कहते हुए हम पर टूट पड़े कि हमें बन्दूकों का डर नहीं लगता।
दोपहर 1.30 बजे सीकर के सीनियर आफिसर कैप्टन वेब भी जयपुर पुलिस के विशेष दस्ते के साथ कूदन पहुंचे। उसके बाद कूदन में पुलिस का दमनचक्र चला। पुलिस ने बदले की कार्यवाही करते हुए लोगों पर भयंकर अत्याचार शुरू कर दिये। घटना के बाद पुलिस द्वारा गांव में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई जिसके कारण देश-विदेश के समाचार पत्रों में कूदन काण्ड की अतिरंजित खबरें छपी। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इस घटनाक्रम में 11 सरकारी कारिंदे और 18 किसान जख्मी हुए। चार किसान मारे गये और 104 को मौके से गिरफ्तार किया गया। इतिहासकार अरविन्द भास्कर बताते हैं कि अकोला महाराष्ट्र से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ने 11 मई 1935 के अंक में एक बड़ा संपादकीय लिखते लिए इस काण्ड को राजपूताना का जलियावाला कांड की संज्ञा दी थी। लम्बे समय से इतिहास में उपेक्षित रहे सीकर किसान आन्दोलन को हाल के वर्षों में न केवल स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है बल्कि प्रतियोगी परिक्षाओं में भी इससे काफी प्रश्न पूछे जा रहे हैं। जिससे इसे पर्याप्त महत्व मिला है।