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सीकर. दंग की नाशिया स्थित पाŸवनाथ भवन में जैन मुनि विश्रान्त सागर ने कहा कि त्याग करने वाले को फल हमेशा ही बड़ा मिलता है। त्याग में ही जीवन की सफलता है। गलत कार्य का नतीजा हमेशा गलत ही रहता है। मनुष्य जीवन में कोई असामाजिक घटना होती है तो मनुष्य भगवान को दोष देता है, पर भगवान दुख नहीं देते। भगवान तो अपनी आत्मा में लीन रहते हैं। आत्मा के तीन प्रकार बताते हुए कहा कि बहीर आत्मा, अंतर आत्मा और परमात्मा। सम्यक दृष्टि की विशेषता यह होती है कि वह स्वयं दुखी रहते हुए भी सभी को सुख देता है। उदाहरण देते हुए बताया कि किसी को किसी के थप्पड़ मारने से खुशी मिलती है तो जिसने थप्पड़ खाया वह यह सोचता है कि अगर किसी को मुझे थप्पड़ मारने से खुशी मिलती है तो चलो मैं किसी की खुशी का कारण तो बना। दुख में या कष्ट में कभी भी धर्म को दोष मत दो, क्योंकि कष्ट और दुख अशुभ कर्म के उदय से हुआ है। अशुभ कर्म के उदय में पुण्य का उदय नहीं होता है। इसी प्रकार पुण्य कर्म मनुष्य को अच्छाई की ओर ले जाते हैं। शुक्रवार को प्रवचन से पूर्व मांगलिक क्रिया महेश बाकलीवाल की ओर से की गई। मंगलाचरण बाबीता पहाडिय़ा की ओर से किया गया । इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
पराए धन व पराई स्त्री का त्याग करें
सीकर. प्रवचन के दौरान शुक्रवार को डूंगरदास महाराज ने रामकथा के कई प्रसंग सुनाए। उन्होंने कहा कि वानर सेना ने पुल बांध दिया। तब भगवान श्रीराम ने उस पुल की प्रशंसा की। तब वानर सेना बोली, महाराज इसमें हमारी क्या प्रशंसा है, यह तो आपकी कृपा से बना है। इसके बाद भगवान ने समुद्र में एक पत्थर फेंका, वह समुद्र में डूब गया, तब भगवान बोले देखो, मेरे हाथ से छोड़ा हुआ पत्थर ही डूब गया। तब वानर सेना बोली, महाराज जिसको आपने छोड़ दिया वह तो डूबेगा ही। मंदोदरी ने रावण को समझाया कि नाथ जिसको बल व बुद्धि से नहीं जीता जा सकता, उससे बैर नहीं करना चाहिए। पराए धन, पराई स्त्री का त्याग करना चाहिए। प्रवक्ता गुलाब सिंह शेखावत ने बताया कि प्रवचन सुनने प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं।
Updated on:
03 Aug 2018 10:53 pm
Published on:
03 Aug 2018 10:53 pm
