
लोकसभा चुनाव में भाजपा से इसलिए पिछड़ी कांग्रेस, जानें विधानसभावार वजह...
सीकर. लोकसभा चुनाव में सीकर के मतदाताओं ने एक बार फिर भाजपा प्रत्याशी स्वामी सुमेधानंद सरस्वती को भारी मतों से जिताया है। सुमेधानंद सरस्वती ने 2 लाख 97 हजार मतों से तीन बार के सांसद और कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष महरिया को शिकस्त देकर रिकॉर्ड मतों से जीतने का इतिहास रच दिया है। भाजपा और कांग्रेस की जीत हार का विधानसभावार विश्लेषण करें तो अलग अलग मुद्दे सामने आए हैं। जिन पर पेश है एक खास रिपोर्ट:-
1. खंडेला: खंडेला व मील की गुटबाजी पड़ी भारी, 45233 का अंतर
खंडेला विधानसभा क्षेत्र में पूर्व केन्द्रीय मंत्री व मौजूदा विधायक महादेव सिंह खंडेला व सुभाष मील की गुटबाजी कांगे्रस पर भारी रही। भाजपा को यहां से 45 हजार 223 मतों से लीड मिली। जबकि विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को इस अंतर से कम वोट मिले थे। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में यहां से सुभाष मील को टिकट दिया था। इसके बाद पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने बगावती तेवर अपनाते हुए ताल ठोक दी और चुनाव में जीत भी हासिल की थी। इसके बाद लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने खंडेला को भी पार्टी में ले लिया। लेकिन दोनों प्रत्याशी के मतों को जोड़े तो कांग्रेस को लगभग एक लाख मतों की लीड मिलनी तय थी।
2. श्रीमाधोपुर: सबसे लंबा अंतर, 52389
श्रीमाधोपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को सबसे लंबी लीड मिली। श्रीमाधोपुर में भाजपा को 52 हजार 389 मतों की लीड मिली। यहां कांग्रेस के विधायक व पूर्व विधानसभाध्यक्ष दीपेन्द सिंह शेखावत का जादू भी पूरी तरह बेअसर रहा। कांग्रेस शुरूआत से ही श्रीमाधोपुर को कमजोर मानकर चल रही थी। ऐसे में यहां मुख्यमंत्री की सभा भी कराई, लेकिन वोट नहीं मिले।
3. धोद व दांतारामगढ़: पूरी तरह बदल गए समीकरण
दांतारामगढ़ में विधानसभा चुनाव में पहली बार जीतने वाले वीरेन्द्र सिंह भी पार्टी को आगे नहीं रख सके। दांतरामगढ़ में भाजपा 40 हजार 828 मतों से आगे रही। हालांकि विधानसभा चुनाव में काफी करीबी मुकाबले में चुनाव जीते थे। धोद में 38 हजार 203 मतों से भाजपा आगे रही। जबकि विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा को करारी हार मिली थी। लंबे अर्से बाद कांग्रेस ने धोद के किले पर कब्जा जमाया था। लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद ही यहां समीकरण बदलने लगे। इसका परिणाम लोकसभा चुनाव के दौरान देखने को मिला है। दूसरी बड़ी बात यह रही कि धोद में माकपा के कार्यकर्ताओं ने परसराम मोरदिया की धोद में इन्ट्री के लिए सुभाष महरिया को ही जिम्मेदार मानते हुए इस चुनाव में कांग्रेस को निशाने पर रखा।
4. लक्ष्मणगढ़: जहां से विधानसभा चुनाव हारे, वहां भी पीछे
कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष महरिया भाजपा के टिकट पर लक्ष्मणगढ़ से विधायक का चुनाव भी लड़ चुके है। यहां से वर्तमान धोद विधायक परसराम मोरदिया भी लंबे समय तक विधायक रहे है। ऐसे में माना जा रहा था कि यहां सबसे अधिक लीड मिलनी है। यही से वर्तमान में शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा भी विधायक है। लेकिन यहां भी कांग्रेस कोई करिश्मा नहीं दिखा सकी। लक्ष्मणगढ़ में भाजपा को 27 हजार 176 मतों सेआगे रही।
5. सीकर: वाहिद साथ, फिर भी पीछे
शहरी मतदाताओं के भाजपा के साथ जाने की अटकलों के बाद कांग्रेस ने वाहिद चौहान को आखिरी समय के प्रचार अभियान में साथ लिया। इस हिसाब से आंकलन करें तो कांगे्रस को लगभग 50 हजार की लीड मिलनी थी। लेकिन यह गणित भी कांग्रेस के लिए उल्टा साबित हुआ। यहां भी कांगेस लगभग 16 हजार 338 वोटों से पीछे रह गई।
6. नीमकाथाना: कांगे्रस की गुटबाजी की नहीं हुई भरपाई
विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस का दामन छोडऩे वाले रमेश खंडेलवाल और वर्तमान विधायक सुरेश मोदी के बीच अंदर ही अंदर चल ही तेज दौड़ यहां कांग्रेस की हार का कारण बनी। नीमकाथाना में कांग्रेस लगभग 32544 मतों से पीछे रह गई। जबकि विधानसभा चुनाव में यहां से भाजपा के प्रेमसिंह बाजौर को करारी शिकस्त मिली थी।
7. चौमू में फिर भाजपा का कब्जा
संसदीय क्षेत्र में यही सीट ऐसी थी जहां से भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने बढ़त का सिलसिला जारी रखा। चौमूं में भाजपा को 37 हजार 523 मतों की लीड मिली। कांग्रेस ने यहां राहुल गांधी की सभा भी कराई। लेकिन यह सभा भी कांग्रेस को जीत दिलाने में पूरी तरह विफल रही।
Published on:
24 May 2019 04:46 pm
