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1947 के साक्षी रहे लोग बोले: आजादी के जश्न पर सिरोही शहर के इस स्थान पर पहली बार फहराया था राष्ट्रध्वज

आजादी के साक्षी रहे बुजुर्गों ने ताजा की पहले जश्न की यादें
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sirohi

August 15, 1947 sirohi

सिरोही. आजादी के जश्न का दिन। यानी 15 अगस्त। यह एक ऐसा दिन है जिसे समूचा भारत एक त्योहार के तौर पर मनाता है। इस दिन शताब्दियों की गुलामी के बाद देश ने आजाद माहौल में सांस ली। यह दिन इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है, जब ब्रिटिश हुकूमत ने देश के संचालन की कमान भारतीयों के हाथ में सौंप दी थी। सिरोही में आजादी का जश्न जोश के साथ मना था। युवाओं की टोली इंकलाबी नारे लगाती राष्ट्रध्वज लेकर शहर में घूमी थी। ढोल-नगाड़े बजे थे। पैलेस के पास टेकरी पर तिरंगा फहराया गया था। पत्रिका टीम ने मंगलवार को पहले स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त 1947 के साक्षी रहे लोगों से बात की तो उनके जेहन से गौरवान्वित करने वाले संस्मरण निकले। वे हूबहू आपके सामने रख रहे हैं।

जश्न ही दीपावली सरीखा बन गया..
जैसा कि राठौड़ लाइन निवासी लक्ष्मणसिंह राठौड़ कहते हैं कि देश को आजादी मिलने के समय करीब 20 साल के थे। उस समय दिल्ली से आने वाली खबरें रेडियो से सुना करते थे। हमें कुछ दिन पहले ही अंग्रेजों के भारत छोडऩे की भनक लग गई थी, बस आजादी की घोषणा होनी बाकी थी। जैसे ही रेडियो से आजादी मिलने का समाचार मिला, खुशी से झूम उठे। शहर में जगह जगह मिठाई बांटी गई। संतोषीमाता मंदिर के पास सामूहिक ध्वजारोहण किया गया। भारत माता की जय घोष के साथ रैली निकाली। जश्न दीपावली सरीखा बन गया था।

उस समय सिरोही छोटा-सा कस्बा था...
नयावास निवासी मोड़सिंह परमार का कहना है कि आजादी के समय में वे सिर्फ 16 साल के थे। उस समय सिरोही शहर इतने लम्बे भू-भाग में फैला हुआ नहीं था। छोटे से कस्बेनुमा था। यहां की आबादी भी सैकड़ों में ही रही होगी। वे बताते हैं कि आजादी मिलने वाले दिन लोगों में खुशी का माहौल था।
लोगों ने अपने घरों पर ध्वज लगाए थे, प्रजा मंडल का संगठन था, मंडल में गोकुल भाई भट्ट समेत कई जने शामिल थे। हम सबने टोलियों में गोकुल भाई भट्ट के साथ गली-गली जाकर जश्न मनाया था और मिठाई बांटी थी।

इंकलाब जिंदाबाद के नारों से गूंजा था सिरोही
सार्दुलपुरा निवासी मदनसिंह बारड़ ने बताया कि वे दस वर्ष के थे, तब देश आजाद हुआ था। उनके जेहन में आजादी की यादें आज भी ताजा हैं। आजादी की सूचना से हर किसी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जगह-जगह इंकलाब जिंदाबाद के नारे लग रहे थे। युवाओं की टोली रात 12 बजे विशाल तिरंगा झंडा लेकर पहाड़ी की चोटी पर चढ़ी तथा वहीं से इंकलाबी नारे लगाए थे। अलसवेरे गोकुलभाई भट्ट के नेतृत्व में शहर में रैली निकाली जिसमें बच्चे, बुजुर्ग तथा महिलाओं ने भाग लिया। रैली में सभी लोग विजय भारत के नारे लगाते शामिल हुए।

खुशी इतनी कि पहाड़ी पर चढ़ गए..
सिरोही के कलावंतवास के पास रहने वाले ईश्वरसिंह गहलोत बताते हैं कि वे 1947 में 15 वर्ष के थे। आजादी की खबर आते ही रात 12 बजे सभी युवा पहाड़ी पर चढ़े और रात को ही ध्वजारोहण किया। पहाड़ी पर ध्वज देखते ही शहर के लोग भी चर्चा करते रहे। 12 जनों की टोली ने टेकरी पर ही वंदे मातरम के नारे भी लगाए। खुशी इतनी थी कि पूछो मत। पहली बार ऐसा लगा कि यह धरती हकीकत में हमारी हो गई है और हम सीना तानकर चल सकते हैं।