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सिरोही. राजकीय पीजी कॉलेज में महिला उत्पीडऩ रोकथाम समिति व महिला प्रकोष्ठ के तत्वावधान में शुक्रवार को एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में डॉ. अनुपमा उज्ज्वल ने समितियों के गठन का इतिहास बताते हुए भंवरी देवी प्रकरण व विशाखा बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान के दिशा निर्देशों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकारी, अद्र्ध सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यालायों में यदि कर्मचारियों की संख्या दस से अधिक है, तो इन समितियों का गठन आवश्यक है। इसके अतिरिक्त जिला स्तर पर प्रशासन की ओर से स्थानीय शिकायत समिति का गठन किया जाता है। जहां उत्पीडऩ का शिकार महिलाएं शिकायत दर्ज करा सकती है। इन शिकायतों का निस्तारण 90 दिन के अन्दर करना अनिवार्य है। राजकीय विधि महाविद्यालय सहायक आचार्य नरेश मीणा ने महिला उत्पीडऩ के साथ-साथ पुरुष उत्पीडऩ की संभावना पर भी बल दिया। इस परिचर्चा में भाग लेते हुए बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र बलवन्त देवासी ने कहा कि बदलती स्थितियों के साथ महिलाएं सशक्त हुई है। ऐसे में पुरुष उत्पीडऩ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। डॉ. अनुपमा साहा ने कहा कि पितृ सत्तात्मक समाज में पुरुष को उच्चतर मानने की विचारधारा ही महिलाओं के शोषण के लिए जिम्मेदार है। यह विचारधारा शिक्षा के विकास के बावजूद आज भी बरकरार है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने भंवरी देवी प्रकरण का सविस्तार उदाहरण दिया। इसलिए महिलाओं को सुरक्षा की आज भी आवश्यकता है। महिला उत्पीडऩ को रोकने के लिए आरोपी के लिए सजा का प्रावधान होना आवश्यक है। इसलिए कार्य-स्थल पर महिला उत्पीडऩ को रोकने के लिए वर्ष2013 में कानून पारित किया गया। महिला उत्पीडऩ रोकथाम समिति की प्रभारी डॉ. उषा चौहान ने कहा कि ऐसी स्थिति में महिलाएं शिकायत दर्ज कराए, न कि स्थिति को छुपाने का प्रयन्न करें। इसके लिए जरूरी है कि उन्हें इससे सम्बंधित नियम-कानून की जानकारी हो।
Published on:
11 Jan 2019 07:01 pm
