
बांध के बीचोंबीच स्थित सोनाधारी महादेव मंदिर। फोटो- पत्रिका
नागाणी (सिरोही)। अरावली की गोद में स्थित टोकरा बांध अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण हर साल चर्चा में रहता है। चारों ओर पहाड़ियों से घिरा यह बांध न केवल किसानों के लिए जीवनरेखा है, बल्कि धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र भी है। बांध के बीचोंबीच स्थित सोनाधारी महादेव मंदिर इसकी सबसे खास पहचान है। यह मंदिर वर्ष में केवल तीन महीने ही दर्शन के लिए खुला रहता है, जबकि बाकी नौ महीनों तक पानी में डूबा रहता है।
अप्रेल के अंत या मई के पहले सप्ताह में जब जल स्तर घटता है, तब यह मंदिर जलमुक्त होता है और श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना कर पाते हैं। जैसे ही जुलाई में बारिश का दौर शुरू होता है, मंदिर फिर से पानी में समा जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बांध किनारे एक वैकल्पिक मंदिर भी बनाया गया है, जहां नियमित पूजा होती है।
टोकरा बांध की कुल भराव क्षमता 31 फीट है, जिसमें से 7 फीट पानी पेयजल के लिए आरक्षित रखा गया है। जलदाय विभाग ने गर्मी के मौसम में आसपास के गांवों में पानी की कमी न हो, इसे ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया था। शुरुआत में किसानों ने इसका विरोध किया, लेकिन बाद में आपसी सहमति से 7 फीट पानी रिजर्व रखने का निर्णय स्वीकार कर लिया गया।
यह बांध कृषि के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इससे 1042 हैक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। 8 किलोमीटर लंबी नहर पीथापुरा, पामेरा, पोसितरा, मालगांव, हाथल और गुलाबगंज गांवों तक पानी पहुंचाती है। सिंचाई के लिए किसानों से प्रति बीघा 25 रुपए शुल्क लिया जाता है। जल वितरण समिति की बैठक में रबी गेहूं की फसल के लिए चार-चार पाण पानी देने का निर्णय किया गया था। किसानों ने समय पर नहरों की सफाई कर तैयारियां पूरी कीं, जिससे पानी खेतों तक सुचारु रूप से पहुंचा।
टोकरा बांध लगभग हर वर्ष ओवरफ्लो हो जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में अच्छी बारिश होने पर झरनों से पानी की आवक तेज हो जाती है, जिससे बांध जल्दी भर जाता है। पिछले वर्षों में भी बांध समय से पहले ओवरफ्लो हुआ, जिससे किसानों को रबी की फसल के लिए पर्याप्त पानी मिला और उत्पादन बेहतर रहा।
टोकरा बांध बने करीब 59 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन नहरों की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। 8 किलोमीटर लंबी नहर कई स्थानों पर जर्जर हो चुकी है और कुछ हिस्सों में टूट-फूट भी है। हर साल नहर किनारे बबूल की झाड़ियां उग जाती हैं, जिन्हें मजदूरों और मशीनों की मदद से साफ कराया जाता है। समिति अध्यक्ष भरत सिंह देवड़ा के अनुसार मालगांव और पीथापुरा में पुलिया निर्माण की मांग लंबे समय से लंबित है। अब यह बांध जहां एक ओर आस्था का केंद्र है, वहीं दूसरी ओर इसके रखरखाव को लेकर गंभीर सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है।
Published on:
26 Apr 2026 03:53 pm
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