
प्राचीन जीरावला जैन तीर्थ (फोटो- पत्रिका)
सिरोही: सिरोही-कांडला हाइवे से करीब 6 किमी दूर स्थित जीरावल्ली पर्वत की गोद में बसा जीरावला जैन तीर्थ देश-विदेश के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। करीब 2800 वर्ष से अधिक प्राचीन और अद्भुत शिल्पकला का नमूना यह पार्श्वनाथ मंदिर अपनी भव्यता से श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
मान्यता है कि जीरावला तीर्थ की यात्रा सभी जैन श्रावक-साधु करते हैं। इतिहासकार सोहनलाल पटनी की पुस्तक श्री जीरावला दर्शन के अनुसार तीर्थ का निर्माण विक्रम संवत 326 में होना बताया जाता है। मौर्य सम्राट संप्रति के समय इसका जीर्णोद्धार करवाया था। इस तीर्थ में प्रतिदिन करीब 500 से अधिक लोग दर्शनार्थ आते हैं।
जैन शास्त्रों में इस तीर्थ के कई नाम हैं जीरावल्ली, जीरापल्ली, जीरिकापल्ली एवं जयराजपल्ली, लेकिन इसका नामकरण इसके पर्वत जयराज पर हुआ है। जयराज की उपत्यका में बसी नगरी जयराजपल्ली। श्री जिनभद्रसूरिजी के शिष्य श्री सिद्धान्तरुचिजी ने श्री जयराजपुरीश श्री पार्श्वनाथ स्तवन की रचना की है। इसी जयराजपल्ली का अपभ्रंश रूप आज जीरावला नाम में जाना जाता है। मंदिर में प्रतिदिन 500 से अधिक लोग दर्शन करने आते हैं।
जैन मान्यता के अनुसार जैन मंदिरों में प्रतिष्ठा एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का प्रारंभ श्री जीरावला पार्श्वनाथाय नम: के मंत्राक्षर केसर से लिखे जाप से होता है। यहां मूलनायक पार्श्वनाथ के साथ प्रदक्षिणा में 108 पार्श्वनाथ विराजमान हैं। यह मंदिर करीब 2800 वर्ष से अधिक प्राचीन है। यह भी बताया जाता है कि जीरावला 506 ई. से 1324 ई. तक एक महत्वपूर्ण जैन केंद्र रहा है।
भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति खुदाई के दौरान मिली थी। मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ की 18 सेमी ऊंची, श्वेत रंग की पद्मासन मुद्रा में मनमोहक मूर्ति है। गर्भगृह में भगवान पार्श्वनाथ की भव्य मूर्ति है, जिसे कीमती रत्नों और सुंदर वस्त्रों से सजाया हुआ है। मंदिर की मूल प्रतिमा बालू रेत से बनी हुई है। गर्भगृह में पार्श्वनाथ के नीचे, उनकी अधिष्ठात्री देवी पद्मावती की प्रतिमा है।
जैन मान्यता के अनुसार श्री जीरावला पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण 326 विक्रम संवत में हुआ था। मंदिर में पार्श्वनाथ की 108 छोटी मूर्तियां भी स्थापित हैं। मुख्य मंदिर से जुड़ी दो छोटी वेदियों में से एक में नेमिनाथ की मूर्ति है। मंदिर के 52 जिनालय में जटिल रूप से नक्काशीदार खंभे और दीवारें हैं।
विक्रम संवत 330 के आस-पास जैनाचार्य श्री देवसूरी महाराज अपने सौ शिष्यों के साथ यहां विहार करने आए थे। उन्होंने अमरासा की ओर से निर्मित इस मंदिर की विक्रम संवत 331 में प्रतिष्ठा करवाई थी। लेखाकार डायालाल ने बताया कि यहां मंदिर, भोजन शाला, धर्मशाला भरी बनी हुई है। श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था है।
मंदिर सिरोही जिले के रेवदर ब्लॉक में स्थित है। यहां सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। मंदिर से निकटतम रेलवे स्टेशन आबूरोड है। यहां से मंदिर करीब 47 किमी दूर है। आबूरोड से मंदिर तक टैक्सी, बस या निजी वाहन से पहुंच सकते है। वहीं, सिरोही जिले से इस मंदिर की दूरी करीब 64 किमी है। जिला मुख्यालय सिरोही से सिरोही-कांडला हाईवे होते हुए रेवदर और फिर रेवदर से 6 किमी दूर मंदिर स्थित है।
Published on:
27 Aug 2025 11:34 am
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