
कारगिल विजय दिवस पर विशेष: जानिये युद्ध में अमर शहीद हुए कैप्टन मनोज पांडेय की विजयगाथा
सीतापुर. "कर चले हम फिदा जाने तन साथियों अब तुम्हारे हवाले साथियों" जी हां कहने को तो ये चंद लाइनें हैं मगर इनकी गहराई को समझने पर आत्मा तक सिहर जाती है। जरा आप ही सोच कर देखिए कि अगर सामने आपकी मौत हो तो आप क्या करोगे? शायद आप खुद को बचाने का हर वो प्रयास करोगे जो हर शख्स करता है। लेकिन 26 जुलाई 1999 की रात हमारे जवानों ने ऐसा नही किया। हमारे जवानों ने सीने पर गोलियां खाकर अपनी भारत माता के आंचल को दुश्मनों से बचाने के लिए बस कदम से कदम आगे बढ़ाते गए और मातृभूमि की रक्षा में शहीद होते गए।
हम बात कर रहे हैं कारगिल युद्ध की जिसको बीते एक अरसा हो चुका है लेकिन शहीदों के परिवारों के जख्म भर पाना नामुमकिन है। 26 जुलाई आते ही हर उस परिवार कब जख्म हरे हो जाते हैं जिन्होंने उस युद्ध में अपने बेटे, भाई, पति या पिता को खोया था। बहने एक बार फिर राखी को देखकर रो पड़ती है और मां-बाप घर में खड़ी कोने में लाठी का सहारा लेकर बाहर अकेले ही निकल पड़ते है जानते हो क्यों? क्योंकि इन्होंने कारगिल ने इनसे इनके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया था।
अमर शहीद कैप्टन मनोज पांडेय का इतिहास
कारगिल युद्ध के महानायक अमर शहीद कैप्टन मनोज कुमार पांडेय जिन्होंने अपने पराक्रम के चलते अपने साथियों को पीछे छोड़ते हुए अकेले ही टाइगर हिल पर बने दुश्मनों के बंकर पर धावा बोल दिया था। दुश्मनों ने भारतीय फौज के जवान को देख कर अंधाधुंध गोलियां बरसाई। लेकिन भारत के वीर सपूत ने अपनी जान की परवाह न करते हुए दुश्मनों पर कहर बन कर टूटे। सीने में कई गोलियां लगने के बाद भी भारत माँ के इस वीर सपूत ने बंकर में मौजूद सभी घुसपैठियों को ठिकाने लगा दिया था और 3 जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा कर भारत माँ की गोद मे सदा के लिए सो गया था। मनोज पांडेय के इस साहसिक कदम ने जहाँ पूरे देश का सर विश्व के सामने ऊंचा कर दिया था। तो वही उनकी शहादत से पूरे देश की आंखे नम कर दी थी। हर हिंदुस्तानी को भारत मां का एक जाबांज बेटा खोने का गम था।
शहीद मनोज की स्मृति में बना भवन व पार्क उपेक्षा का हुआ शिकार
सीतापुर जिले के रुढा गांव में 25 जून 1975 को जन्मे मनोज कुमार पांडेय का बचपन तो गांव में बीता लेकिन उनकी प्राथमिक शिक्षा लखनऊ में हुई। जिसके बाद उन्होंने सैनिक स्कूल में प्रवेश लिया। जिसके बाद वह सेना में शामिल हो गए। भारतीय सेना में भर्ती होने के बाद जब भी मनोज गांव आते थे तो गांव वालों को अपनी कार्यशैली और वहाँ के बारे में बताया करते थे। लेकिन शायद ही किसी को पता होता कि मनोज एक दिन देश की सेवा में इतने लीन हो जायेगे की फिर वो कभी गांव वालों से नही मिल पाएंगे। कारगिल युद्ध के दौरान जब मनोज पांडेय के शौर्य और शहादत की सूचना गांव पहुँची तो पूरे गांव को अपने बेटे की शौर्य पर गर्व था लेकिन उसे खो देने का गम सभी के आंखों से आशू बन कर बह रहा था। उस दिन मनोज पांडेय की शहादत पर गांव ही नही बल्कि पूरे देश रोया था। इस दौरान केंद्र और राज्य सरकार ने गांव के विकास के लिए कई वादे भी किये थे। लेकिन 19 साल बाद भी आज तक शाहिद का गांव कस का तस है। कैप्टन मनोज पांडेय की स्म्रति में बनाया गया पार्क जीर्ण शीर्ण हो चुका है तो शाहिद की जन्म स्थली विकास की बाट जोह रही है। वही गांव में अब तक उच्च शिक्षा की व्यवस्था तक नही हो सकी है।
आखिर शहीद दिवस पर ही क्यों याद आते हैं शहीद
सोचने वाली बात तो यह है कि 15 अगस्त, 26 जनवरी या 26 जुलाई इन खास मौकों पर हमारे देश के शहीद याद किये जाते है। सरकार भी इन शहीदों के परिवार वालों को सुविधाएं देने के नाम पर खानापूर्ति करती है। सवाल उठता है कि क्या देश के शहीद केवल खास मौके पर ही याद किये जाने चाहिए? गौर करने वाली बात तो यह है कि कौन बनेगा इन शहीदों के परिवार की लाठी कौन लायेगा राखी का इंतजार करती बहन के लिए भाई की कलाई और कौन लायेगा करवाचौथ पर घर के कोने में बैठी उस विधवा के लिए लाल जोड़ा,जिसने कारगिल के युद्ध मे अपना सब कुछ खो दिया।
Updated on:
26 Jul 2018 12:09 pm
Published on:
26 Jul 2018 11:29 am
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