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अमरसिंह राव.
सिरोही जिला प्रमुख के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और वोटिंग हो गई। उनकी कुर्सी भी बच गई। अनौपचारिक रूप से इस घटनाक्रम में शामिल कुछ अपनों के चेहरे भी बेनकाब हो गए। उनके चेहरों की हवाइयां हकीकत बयां कर रही थीं। साथ ही, जिला परिषद के लापता दो सदस्य एकाएक सीईओ सभागार में प्रकट हो गए। वह भी पुलिस के लम्बे-चौड़े लवाजमे के बीच से। वोट देने के लिए। सबसे ज्यादा हैरानी इसलिए कि इन दोनों के परिजनों ने दो दिन पहले ही जिले के कालन्द्री और रोहिड़ा थाने में गुमशुदगी दर्ज करवाई थी।
मतदान टालने को लेकर जोधपुर हाईकोर्ट में एक पक्ष की ओर से याचिका लगाई जिसमें दो सदस्यों के लापता होने का हवाला भी दिया गया लेकिन यह याचिका मंगलवार को खारिज कर दी गई। याचिका खारिज होते ही लापता दोनों सदस्य बैठक में पहुंच गए। सबसे बड़ा सवाल यह कि कहीं इन दोनों सदस्यों ने लापता होने की कहानी तो नहीं रची थी? यदि रची थी तो क्यों? और यदि नहीं रची तो ये एकाएक बैठक में कैसे प्रकट हो गए? वह भी एक साथ। कहीं कहानी रच कर पुलिस और कानून का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे? दिलचस्प यह कि दोनों ही सदस्य अच्छे परिवारों से हैं और समाज में इनकी पैठ है। क्या इन्हें बदनामी का भय भी नहीं था? फिर सवाल यह भी उठता है कि आखिर ऐसे बुद्धिजीवी जनप्रतिनिधि भी लापता हो सकते हैं? कहीं ऐसा किसी के कहने पर तो नहीं किया?
कानून का पालन करवाने वाले लवाजमे के बीच से दोनों ‘लापता’ सदस्य गुजरे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। होना तो यह चाहिए था कि इन्हें पकडक़र संबंधित थाने में पेश किया जाता। इनसे पूछताछ होती। जिन्होंने गुमशुदगी दर्ज करवाई, उन्हीं के ही साथ आना भी सवाल खड़े करता है।
बहरहाल, जिला प्रमुख के खिलाफ भाजपा सदस्यों में ही आक्रोश है। इसके कारणों की तह तक जाने की जरूरत है। क्या वाकई में इनके क्षेत्र में काम नहीं हुए या फिर किसी के बहकावे में आकर ऐसा किया गया।
