
श्रीगंगानगर। श्रद्धालुओं ने मजार पर शीस नवा कर तथा धागा बांधकर अपनी इच्छापूर्ति की कामना की। मेले में आसपास के गांवों के विभिन्न स्थानों से लोग आए और मेले का आनंद उठाया। सभी धर्मों की आस्था की प्रतीक लैला-मजनू की इस मजार पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना आरम्भ हो गया तथा दोपहर होते-होते मेले में जनसैलाब उमड़ पड़ा देखते ही देखते मजार पर माथा टेकने के लिए लम्बी लाईन लग गई।
मेले में जहां देखो वही जन सैलाब नजर आ रहा था। मेले में जगह-जगह प्रसाद की दुकानों के अलावा खाने-पीने की,रेेडिमेड वस्त्र,साज-सज्जा और खिलौनों आदि की दुकानें भी सजी हुई देखी गई, जिन पर लोगों ने जमकर खरीददारी की।
शुक्रवार को दिन भर धूल भरी आंधी चलती रही इसके बावजूद भी लैला-मजनूं की मजार के प्रति आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं लोग की भीड़ बिना खराब मौसम की परवाह किए मजार पर धोक लगाने के लिए सुबह से शाम तक पहुंचे।
पुलिस के साथ साथ सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी रहे चौकन्ने
मेले में हर साल की तरह इस बार भी सुरक्षा व्यवस्था के नजरिए से पुलिस के जवान तैनात रहे। यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए वाहनों को मेला स्थल से पहले ही रोक लिया गया। मेले में अव्यवस्था नहीं हो इसके लिए पुलिस पूरी तरह से मुस्तैद थी। पुलिस के साथ साथ सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने भी पूरी चौकसी बरती। सीमा सुरक्षा बल के जवानों की इन मजारों के प्रति शुरु से ही आस्था रही है। मनोरंजन हेतु मेले में पंजाबी अखाड़े का आयोजन हुआ, जिसका आनंद लोगों ने जमकर लिया।
लैला-मजनू की मजार के प्रति ये है धारणा
लैला मजनू कमटी के पुराने सेवादारों ने मजार के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वे 1962 से बिंजौर गांव में रह रहे हैं, तब यहां पूरे क्षेत्र में जंगल था और घग्घर बाढ़ के दिनों में लैला-मजनू की मजार के चारों ओर भारी मात्रा में पानी भर जाने के बावजूद भी मजार में पानी नहीं जा पाता था।
उन्होंने बताया कि 1965-66 में उन्होंने यह मंजर अपनी आंखों से देखा साथ ही मजार के ऊपर 2 दीपक अपने आप जलते और बुझते रहते थे। सीमा पर तारबंदी से पूर्व पाक क्षेत्र से भी मुस्लिम लोग लैला-मजनू की मजार पर मन्नत मांगने आया करते थे और उनसे ही जानकारी मिली थी कि यह मजार लैला-मजनू की है और ये अमर है, उन्होंने सच्चा प्यार किया था।
ग्रामीणों के अनुसार मजनू और लैला दोनों ने की प्यास से तड़प तड़प कर यहां जान निकली थी, तभी से ही यह मजार बनी है।
उन्होंने बताया कि 1972 में इस मजार पर एक पर्चा हुआ, उसके बाद मान्यता बढ़ती गई और भारी मेला लगने लगा, जनसहयोग से चंदा एकत्र करके कमेटी द्वारा हर साल मेले की सभी व्यवस्थाएं की जाती है। उन्होंने बताया कि मजार पर सच्चे मन से मन्नत मांगने वाले लोगों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है, इसलिए लैला-मजनू की यह मजार प्रेमी जोड़ों के लिए आस्था का केन्द्र बनी हुई है।
Published on:
15 Jun 2018 05:48 pm
