
पहाड़ काटकर लोगों के लिए रास्ता बनाने वाले बिहार के दशरथ मांझी आपको जरूर याद होंगे। अब एक और दशरथ मांझी सामने आए हैं महाराष्ट्र के वाशिम जिले के कलांबेश्वर में। यहां के बापूराव ताजने की पत्नी को जब ऊंची जाति वालों ने कुएं से पानी नहीं लेने दिया तो उन्होंने महज 40 दिनों में अपनी पत्नी के लिए कुआं खोद दिया। बापूराव ताजने ने जो कुआं खोदा है आज उसका इस्तेमाल सभी दलित कर रहे हैं।
अपमान और उपहास के संयोग से उपजी कहानी
कुआं खोदने के लिए अदम्य साहस और दृढ निश्चय की ये कहानी अपमान और उपहास के संयोग से उपजी है। दरअसल, पानी की कमी के कारण ताजने की पत्नी घर से दो किलोमीटर की दूरी पर कुएं से पानी लेने गई थी, लेकिन कुएं की मालकिन ने उसे अपमानित किया और पानी लेने से मना कर दिया। बिना पानी के घर पहुंची पत्नी ने पूरी कहानी अपने पति बापूराव ताजने को बताई।
लोगों ने कहा पागल
पत्नी के अपमान को लेकर ताजने ने गुस्सा नहीं किया। पत्नी के अपमान को साहस में बदलकर जब ताजणे ने कुआं खोदना शुरु किया तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। लोगों ने उनके निश्चय को तोडऩे की कोशिश की और कहा कि पथरीले इलाके में पानी कहां मिलेगा।लोगों ने उन्हें पागल तक कहा।
मजदूरी के बाद रोजाना 6 घंटे खोदा कुआं
ताजने को अपनी मेहनत पर विश्वास था। उन्होंने कुआं खोदना जारी रखा। वे रोजाना 8 घंटे की मजदूरी के बाद छह घंटे तक कुआं खोदते। इस काम में कुदरत ने भी उसका साथ दिया और 13 फुट की खुदाई के बाद ही कुएं में पानी आ गया। इसके बाद ताजने का नाम महाराष्ट्र में एक हीरो की तरह बन कर उभरा।
अपमानित होते नहीं देखना चाहते ताजने
रोचक बात यह है कि जिस गांव के लोग उसका मजाक उड़ाया करते थे, उसने उन्हीं लोगों के लिए कुएं को पूरे गांव के लिए खोल दिया है। उसका मानना है कि वह लोगों को अपनी तरह अपमानित होते नहीं देखना चाहता।
Published on:
08 May 2016 08:14 pm
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