
TRIBAL DAY : स्वयं को देश का मालिक और दूसरों को बाहरी मानता हैं यह आदिवासी समुदाय
दिनेश एम. त्रिवेदी
सूरत. मतदान में शामिल नहीं होकर व बसों व ट्रेनों में अक्सर टिकट नहीं लेकर खुद को देश का मूल बीज और मालिक बताने वाले सती-पति संप्रदाय के आदिवासियों को मुख्यधारा से जोडऩा सरकार के लिए चुनौती हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षो से जो थोड़े बहुत प्रयास हुए थे। उनके सार्थक परिणाम भी देखने में आए हैं, लेकिन इन्हें व्यापक करने की जरूरत हैं।
बताया जाता हैं कि इस विचारधारा को 1930 में बैरिस्टर टेटिया कानजी गामित ने शुरू किया था। यह आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकार से जुड़ा था। टेटिया कानजी आदिवासियों के 'कटासवाण वाले दादाÓ कुंवर केश्री सिंह के पिता थे। केश्रीसिंह ने पूरा जीवन आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई में बिताया। उन्होंने सती-पति मूवमेंट को बढ़ाया। वे अपनी गाड़ी पर ए/सी भारत सरकार लिखते थे।
पुलिस से सामना होने पर भिड़ जाते, अदालती कार्रवाइयां भी हुई। उनके समर्थक आदिवासी सरकार व प्रशासन को मानने से इनकार करते हैं। अपने इलाकों में सफेद रंग का बोर्ड लगाते हैं जिस पर लिखा होता है 'ए/सी भारत सरकारÓ। 'सेवा जोहारÓ इनका प्रमुख नारा है। दावा हैं कि 1969 में कोर्ट में उन्होंने खुद को भारत की मूल मिट्टी, मूल बीज व मूल वारिस साबित कर दिया था।
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कुंवर केश्री सिंह का जन्म तापी जिले के कटासवाण गांव में हुआ था। उनके पुत्र रविन्द्रसिंह उनके आंदोलन विश्व शांति पर आधारित बताते हैं। वे हर साल अहिंसा व विश्व शांति के लिए सम्मेलन करते हैं। उनके अनुयायी उन्हें भारत की असली सरकार, भारत के खजाने का मालिक मानते है। सती-पति संप्रदाय के लोग देवी-देवता को नहीं मानते। ये लोग अभिवादन के लिए 'स्वकर्ता पितु की जयÓ का इस्तेमाल करते हैं।
पहचान के कोई दस्तावेज़ इन लोगों के पास नहीं है। जिससे इनकी संख्या का भी कोई आंकड़ा नहीं है। गुजरात के अलावा पडोसी महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी इनकी मौजूदगी हैं। दक्षिण गुजरात में होने वाले इनके कार्यक्रमों में 3-4 हजार की भीड़ जुटती हैं।
कुछ वर्षो में दक्षिण गुजरात के जिलों में कुछ अधिकारियों ने इनकी समस्याओं को समझा और निराकरण किया। जिनके परिणाम भी मिले। कई लोगों ने वोटर आइडी बना कर मतदान में हिस्सा लिया। बच्चों को पोलियो पिलाने, स्कूल भेजने और सरकारी दवाएं लेना शुरू किया।
पृष्ठभूमि को लेकर दावा :
उनका दावा हैं कि 1930 में महात्मा गांधी व इरविन में हुए गोलमेज समझौते में आदिवासियों के लिए अखिल आदिवासी एक्सक्लूडेड पार्शियल एरिया का उल्लेख किया गया था। महारानी विक्टोरिया ने ही आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन का हक सौंप दिया था। ऐसे में आदिवासी जब देश के मालिक हैं तो कोई सरकार उनको कैसे आदेश और निर्देश दे सकती है।
वो लैंड रेवन्यू एक्ट 1921 के पेज नंबर 221 को सन्दर्भ के तौर पर पेश करते हैं और दावा करते हैं कि अंग्रेजों ने 1870 में उनकी जमीन 99 साल के लिए लीज पर ली थी। यह लीज 4 फरवरी 1969 को खत्म हो गई थी। इसके बाद लीज को नहीं बढ़ाया गया। ऐसे में इस देश के आदिवासी ही जमीन के असल मालिक हैं। बाकी सब बाहरी हैैं।
वे जस्टिस काटजू के एक बयान हवाला देकर कहते हैं कि 90 फीसदी से ज्यादा भारतीय विदेशी मूल के हैं। इसके अलावा वे एक रुपए के नोट, न्यायिक और गैर न्यायिक स्टैम्प पेपर आदि जरिए अपने तर्क पेश कर दावा करते हैं कि आदिवासी ही इस जमीन का मूलबीज हैं। वे ही धरती के असली मालिक हैं।
ए/सी भारत सरकार कुटुम्ब परिवार
सती-पति संप्रदाय के लोग कहते हैं कि एसी का मतलब एंटी क्राइस्ट हैं। आज जो कैलेंडर प्रचलन में है, वो ईसा के जन्म से शुरू होता है, लेकिन हमारी भारत सरकार उससे पहले भी थी और हमेशा रहेगी। जिसे आप प्रकृति कहते है, हम उसे भारत सरकार मानते हैं। हम सभी आदिवासी इसी भारत सरकार का कुटुम्ब परिवार हैं। इसका कोई चुनाव नहीं होता है।
जब कानून की किताब नहीं थी, तब भी दुनिया चलती थी। प्रकृति का अपना कानून है, वो कहीं दर्ज नहीं है, लेकिन अपने तरीके से काम करता है। इसलिए इंसान के बनाए हुए कानून को नहीं मानते। हमारा भारत सरकार से सम्बन्ध नॉन ज्यूडिशियल है। कहा जाए तो सती-पति संप्रदाय की बुनियादी मान्यता हैं कि सब कुछ प्रकृति के अनुसार चलना चाहिए और वही असली सत्ता है।
जंगल, नदियां या फिर पहाड़ जो कुछ प्रकृति का हिस्सा हैं उन सबके साथ एक सहअस्तित्व कायम करके रहना ही जीवन जीने का तरीका है। आदमी भी उसी प्रकृति का हिस्सा है। इसी प्रकृति को अपना समझने के लिए शायद वे इसे 'ए/सी भारत सरकारÓ कहते हैं।
Published on:
09 Aug 2020 12:27 pm

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