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गैर मुमकिन रास्ते पर किया था अतिक्रमण, न्यायालय ने सुना दिया ये फैसला

Tonk crime news, Tonk news गैर मुमकिन रास्ते पर अतिक्रमण करने के दोषी ग्रामीणों को शुक्रवार को न्यायालय तहसीलदार देवली ने एक-एक माह के सिविल कारावास से दण्डित किया है।

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गैर मुमकिन रास्ते पर किया था अतिक्रमण, न्यायालय ने सुना दिया ये फैसला

देवली. न्यायालय तहसीलदार (Court tehsildar) देवली ने गैर मुमकिन रास्ते पर अतिक्रमण (Encroachment) करने के दोषी ग्रामीणों को शुक्रवार को एक-एक माह के सिविल कारावास (Imprisonment) से दण्डित किया है।

तहसीलदार रमेशचंद जोशी ने बताया कि आरोपी दुर्गालाल व रामविलास कुमावत निवासी रामथला है, जिन्होंने खसरा नम्बर 1328 से गुजर रहे गैर मुमकिन रास्ते पर अतिक्रमण कर रास्ता बंद कर दिया था, जिसकी तहसील कार्यालय ने पिछले दिनों पटवारी व गिरदावर से रिपोर्ट मंगवाई।

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इसमें दोनों आरोपियों की ओर से रास्ते पर अतिक्रमण करना पाया गया। इस पर 3 जुलाई को पटवारी व गिरदावर ने मौके पर जाकर अतिक्रमण हटाया। उन्होंने बताया कि अतिक्रमण हटाने के दो दिन बाद ही अतिक्रमियों ने पुन:डोल डालकर कब्जा कर लिया।

इस पर न्यायालय तहसीलदार ने शुक्रवार को सुनवाई करते हुए दोनों आरोपियों को भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा (91) के तहत कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों का एक-एक माह के सिविल कारावास से दण्डित किया है। पुलिस ने गिरफ्तार कर शुक्रवार शाम टोंक जेल भेज दिया।

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भुगतान नहीं करने पर नोटिस
टोंक. तृतीय श्रेणी अध्यापकों की सेवा समाप्ति के बाद पुन: सेवा में लिए जाने के बावजूद स्थगित सेवा समय का वेतनमान का भुगतान नहीं करने के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने राज्य के प्रमुख शिक्षा सचिव, शिक्षा निदेशक तथा टोंक के जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक को कारण बताओ नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

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न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा की एकलपीठ ने यह अंतरिम आदेश निवाई उपखण्ड में कार्यरत शिक्षक भागूता लाल गुर्जर, जयपाल लोधा तथा भागचंद जैन की ओर से एडवोकेट लक्ष्मीकांत शर्मा के जरिए दायर की गई याचिका पर प्रारम्भिक सुनवाई करते हुए दिए हैं।

याचिका में बताया कि उनकी नियुक्ति जनवरी 1991 में तृतीय श्रेणी अध्यापक के पद हुई थी। दिसम्बर 1995 में याचिकाकर्ताओं की सेवा बीएड की डिग्री की वजह से समाप्त कर दी। इसे याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में वर्ष 2002 में याचिका दायर कर चुनौती दी।

इसके बाद 20 दिसम्बर 2006 को एकलपीठ ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आदेश देते हुए सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द कर दिया। राज्य सरकार ने दिसम्बर 2009 में याचिकर्ताओ को पुन: सेवा में लेते हुए इनकी सेवाएं नियमित मान ली, लेकिन वर्ष 2002 से 2009 के मध्य के वेतन का भुगतान नहीं किया। इसे याचिका में चुनौती दी गई है। अदालत ने सोमवार को प्रकरण की सुनवाई के बाद सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

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