
प्रमोद सोनी/उदयपुर . उदयपुर शहर से पुराना व ऐतिहासिक आंवली एकादशी का दो दिवसीय मेला शनिवार से गंगू कुंड पर भरेगा। इतिहासकारों का मानना है कि यह मेला उदयपुर की स्थापना से पहले से चला आ रहा है। इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार यह पारम्परिक मेला 800 वर्ष पुराना है। उदयपुर से पूर्व की बस्ती है आहाड़। मेले में बेदला, गोगुंदा, महाराज की खेड़ी आदि गांवों के कुम्भकार मटके बनाकर बेचने आते थे। आज भी इन्हीं क्षेत्रों के कुम्भकार आ रहे हैं। मेले में विशेष तौर पर मटकियों की बिक्री होती है। मेला गर्मी की दस्तक माना जाता है। हालांकि इस बार दोपहर को गर्मी और रात में हल्की सर्दी का अहसास बना हुआ है। आंवली एकादशी पर महिलाएं व्रत रखती है और आंवले के वृक्ष की पूजा करती है। बाद में आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर फलाहार लेती है। इसी दिन परम्परानुसार मटकियां खरीदी जाती हैं। मेले में शहर व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से लोग खरीदारी करने के लिए आते हैं। एक दिन पहले ही दुकानें सज जाती है। दूसरे दिन आंवली एकादशी पर मेले में खासी भीड़ रहती है। मेले में घरेलू सामान व सौंदर्य प्रसाधनों की दुकानों के अलावा चकरी-डोलर लगते हैं।
मिट्टी के कई तरह के बर्तन
मेले मे घी से लेकर पानी भरने तक के मिट्टी के पात्र मिलते हैं। मेले में पानी भरने की कलसी व भाण्डे, दही जमाने के लिए पात्र जावणियां, छाछ बिलौने के लिए गोली, घी रखने के लिए घिलोड़ी, आटा गूंदने की भणई, शादी-ब्याह के लिए महा मटला, रोटी सेकने के लिए केलड़ी, सब्जी व राब के लिए हांडी आदि मिट्टी के पात्र उपलब्ध होंगे।
Updated on:
12 Mar 2019 07:30 pm
Published on:
12 Mar 2019 12:38 pm
