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जेलों से श्रम हुआ गायब, ‘ठाले’ कैदी,…‘मेहमान’ बन तोड़ रहे मुफ्त की रोटियां

फिल्मों में सश्रम कारावास के दौरान कैदियों को सफेद लिबास में पत्थर तोड़ते दृश्य को हर किसी ने देखा होगा, लेकिन बदली परिस्थितियों में जेल में एेसा नहीं है। यहां सश्रम कारावास में बंद सभी कैदी ‘ठाले’ बैठे हंै। उनके पास कोई काम नहीं है।
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उदयपुर

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Krishna

Nov 03, 2019

Central Jail

मोहम्मद इलियास/उदयपुर. फिल्मों में सश्रम कारावास के दौरान कैदियों को सफेद लिबास में पत्थर तोड़ते दृश्य को हर किसी ने देखा होगा, लेकिन बदली परिस्थितियों में जेल में एेसा नहीं है। यहां सश्रम कारावास में बंद सभी कैदी ‘ठाले’ बैठे है। उनके पास कोई काम नहीं है। वे अंदर सरकार के ‘मेहमान’ बने हुए हैं। प्रतिवर्ष उनके रहने-खाने पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। वे अंदर रहकर खुराफात के अलावा अभ्यस्त बंदियों के साथ नई गैंग बनाकर बाहर आते ही अपराध कर रहे हैं। पकड़ में आने के दौरान अधिकांश से पूछताछ में जेल में मिलना व गैंग बनाना सामने आ रहा है। लगातार बढ़ रहे इन अपराध पर अंकुश के लिए सरकार कैदियों को लिए नई फैक्ट्रियां खोलने जा रही है। इन फैक्ट्रियां में बनने वाला सामान बाहर नहीं बेचकर कैदियों के काम आएगा।प्रदेश में 21 हजार 500 बंदी प्रदेश में वर्तमान में 21 हजार पांच सौ बंदी अलग-अलग जेलों में बंद है, इनमें से 6 हजार बंदी सश्रम कारावास की सजा काट रहे है। न्यायालय के आदेश व नियमानुसार उन्हें जेलों में काम नहीं मिल पा रहा है। अधिकांश फैक्ट्रियां बंद हो चुकी है। दिखावे के लिए अभी मशीनों पर ग्रिस ऑयल लगाकर उन्हें चालू किया गया है फिर भी कैदियों की संख्या के मुकाबले उनके पास कुछ काम नहीं है। पुराने जमाने की मशीनों से आज भी थोड़ा बहुत दरी बनाने का काम चल रहा है। शेष मांग के अनुसार कभी कभार टेबल, कुर्सियां व कूलर बनाए जाते हैं।

ताकि बचत हो और सामान भी सही मिले

जेल में बंद इन कैदियों के खाने पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। इनमें प्रतिदिन नहाने, कपड़े धोने एवं शरीर पर लगाए जाने व भोजन बनाने के काम में आने वाले सरसों के तेल पर करीब 3.68 करोड़ खर्च हो रहे हैं। चूंकी यह सामान बाहर से खरीदना पड़ता है अत: सरकार की मंशा है कि जेल में ही इन फैक्ट्रियों की स्थापना कर यह सामान यही बनाया जाए ताकि बचत भी हो और सामान भी सही मिले। इसे लेकर सरकार ने कमेटी भी बनाई है। कमेटी ने सरकार को प्रस्ताव भेजा है। प्रस्ताव के अनुसार जयपुर जेल में नहाने तो उदयपुर में कपड़े धोने के साबुन की फैक्ट्री लगेगी। इसी तरह भरतपुर, दौसा में सरसों के तेल निकालने का काम होगा। तिहाड़ जेल की तरह ही अन्य सरकारी विभागों के कामों को लेने पर मंथन चल रहा है।

नई फैक्ट्रियों पर भी मंथन जेल में सश्रम कारावास के कैदियों के लिए अभी बंद पड़ी मशीनों को चालू किया गया है। नई फैक्ट्रियों पर भी मंथन चल रहा। इसके तहत उदयपुर में कपड़े धोने के साबुन बनाने की फैक्ट्री खोली जानी है।


- सुरेन्द्र सिंह शेखावत, जेल अधीक्षक, उदयपुर केन्द्रीय कारागृह