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उदयपुर पहुंचे रक्षा मंत्री का नई शिक्षा नीति पर जोर; बोले- शिक्षा से आत्मनिर्भर भारत का सपना होगा साकार

रक्षा मंत्री ने कहा कि शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र और भविष्य की पीढ़ियों के निर्माण का सशक्त आधार है।
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उदयपुर

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Kamal Mishra

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Updated: 2 Jan 2026, 9:10 PM IST

RajNath Singh

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (फोटो-पत्रिका)

उदयपुर। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सम्मान का सबसे बड़ा कोई हकदार है तो वह शिक्षक है, क्योंकि वह चरित्र निर्माण करता है। देश में अब तक हुए सामाजिक परिवर्तनों के जनक भी शिक्षक रहे हैं। एक रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि इसी प्रतिष्ठा के कारण वर्तमान में 54 फीसदी अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षक बनाना चाहते हैं। वे शुक्रवार को उदयपुर में विद्या प्रचारिणी सभा भूपाल नोबल्स संस्थान के 104वें स्थापना दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए।

राजनाथ सिंह ने महाराणा भूपाल सिंह के शिक्षा के क्षेत्र में योगदान और साक्षरता बढ़ाने के प्रयासों को याद किया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के साथ परंपरागत ज्ञान तथा आधुनिक शिक्षा का संतुलित समन्वय है। नई शिक्षा नीति में विचारशील, संवेदनशील और चरित्रवान पीढ़ी तैयार करने का लक्ष्य है, जो समाज की समस्याओं का समाधान कर सके।

शिक्षा भविष्य की पीढ़ियों का सशक्त आधार

रक्षा मंत्री ने कहा कि शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र और भविष्य की पीढ़ियों के निर्माण का सशक्त आधार है। इससे पूर्व दोपहर 12.15 बजे बीएन संस्थान परिसर पहुंचे रक्षा मंत्री को एनसीसी कैडेट्स ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। राजनाथ सिंह ने भूपाल सिंह की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए।

अहंकार से दूर रहें विद्यार्थी

विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि मनुष्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से विभूषित होता है। जीवन में सच्ची सफलता प्राप्त करने के लिए मन को अहंकार से मुक्त करना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे कभी अहंकार नहीं रखें। उन्होंने जीवन में संस्कारों और अनुशासन का महत्व बताया।

राजनेताओं पर विश्वसनीयता का संकट

उदयपुर में सैनिक स्कूल की स्वीकृति के संदर्भ में उन्होंने कहा कि मैं अभी वादा तो नहीं कर सकता, लेकिन प्रयास जरूर करूंगा। रक्षा मंत्री ने कहा कि राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी आश्वासन नहीं दिया, क्योंकि वादों और वास्तविकता में अंतर होने के कारण भारत के राजनेताओं पर विश्वास का संकट खड़ा हो गया है। कहीं न कहीं विश्वसनीयता की इस चुनौती को हमें स्वीकार करना पड़ेगा।