
1857 की क्रांति से जुड़़ा़ है टोपीदार बंदूक का इतिहास, देश भर में सिर्फ उदयपुर में बनती है
मोहम्मद इलियास/उदयपुर. टोपीदार बंदूक...। इस बंदूक की बनावट और कार्यशैली को जाने बिना इसे कारतूसी हथियार की श्रेणी में डालने व लाइसेंस नवीनीकरण gun licence Renewal में जटिलता बढ़ाने से अब इसे पास रख पाना भारी पड़ रहा है। हिंसक जानवरों से बचाव के लिए तेज धमाका करने वाली यह बंदूक आदिवासियों का ‘गहना’ होकर उनकी पहचान थी। देश में सिर्फ उदयपुर में बनने वाली यह बंदूक कानूनी बेडिय़ों में इतनी बुरी तरह फंस गई कि इसे रखने व बेचने वालों पर भी संकट आ गया।
टोपीदार बंदूक का इतिहास आजादी की जंग से जुड़ा हुआ है। सन 1857 की क्रांति में टोपीदार बंदूक इजाद हुई। इस बंदूक की नली में बारूद भरकर टोपी लगाई जाती है। इसे चलाने के बाद तेज आवाज के साथ धमाका होता है, जिससे हिंसक जानवर दूर भाग जाता है। क्रांति के बाद यह बंदूक हिंसक पशु-जानवरों से आत्मरक्षा के लिए काम आने लगी और आदिसासियों की पहचान बन गई।
कीमत से ज्यादा लाइसेंस नवीनीकरण पर खर्च
टोपीदार बंदूक की कीमत 3 से 7 हजार रुपए है। अब इसे कारतूसी बंदूक की श्रेणी में रखने से मुश्किलें बढ़ गई है। आदिवासी पहले सरकारी शुल्क जमाकर आसानी से नवीनीकरण करवा लेते थे लेकिन अब चिकित्सकीय व शस्त्र संचालन प्रशिक्षण प्रमाण की अनिवार्यता व स्टाम्प ड्यूटी भुगतान से यह काफी महंगी हो गई। शस्त्र निर्माताओं का कहना है कि रिन्यूअल में प्रमाण पत्र सहित सात से आठ हजार रुपए का खर्च आ रहा जो बंदूक की कीमत से ज्यादा हैं। इसके अलावा चक्कर काटने के बावजूद कोई भी आसानी से प्रमाण पत्र नहीं बना रहा है।
हिंसक पशुओं से बचाव का साधन
उदयपुर संभाग के अलावा सिरोही, अजमेर, कोटा, झालावाड़ में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अनपढ़ किसान हैं। भील, गरासिया अपनी छोटी-मोटी जमीन में बुवाई के साथ ही मजदूरी कर जीवनयापन करते हैं। दूरदराज के इन गांवों में पैंथर, भेडिय़ा, सियार, भालू, नील गाय आदि जानवर खेतों में घुसकर फसल को बर्बाद के साथ ही इंसानों पर हमला करते हैं। इन हिंसक पशुओं से बचने के लिए ही खेतिहर लोग टोपीदार बंदूक काम में लेते हैं।
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आसानी से कोई नहीं बनाता प्रमाण पत्र
- सरकार ने लाइसेंस नवीनीकरण में शस्त्र संचालन प्रशिक्षण प्रमाण पत्र व शारीरिक-मानसिक क्षमता प्रमाण पत्र की अनिवार्यता डाल दी, जिसे बनवाने के लिए अनपढ़, गरीब आदिवासी सक्षम नहीं है
- पूरे राज्य में टोपीदार बंदूक चलाने के लिए शूटिंग रेंज व संचालन का केन्द्र नहीं है जिससे प्रमाण पत्र बनवाना टेडी खीर है।
- शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य प्रमाण पत्र के लिए भी जिला स्वास्थ्य केन्द्र जाकर नाक, कान, गला के वरिष्ठ चिकित्सक एवं फिजिशियन से जांच करवानी होती है जो एक माह में भी पूरी नहीं हो पाती।
Published on:
05 Jul 2019 12:42 pm
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