
राजेश ओझा (फोटो- पत्रिका)
उदयपुर: अरावली सिर्फ पहाड़ शृंखला नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, संस्कृति और भविष्य की उम्मीद है। इसे संरक्षित और सुरक्षित रख नवाचार से जोड़ें तो सपनों को ऊंचाइयां दे सकती है।
पाली जिले के बेड़ा गांव से निकलकर उदयपुर में बसे राजेश ओझा की पहल इसी सोच की मिसाल है। उनकी कहानी उद्यमिता के साथ सामाजिक बदलाव, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी सशक्तीकरण को जोड़ती है। 12वीं के बाद रोजगार की तलाश में राजेश मुंबई गए। रिटेल, डिलीवरी, मार्केटिंग, कमोडिटी और ब्रोकिंग जैसे काम किए।
वर्षों बाद गांव लौटे तो एक साधारण-सा दृश्य निर्णायक बन गया। गांव के चौराहे पर महिलाएं टोकरियों में सीताफल बेच रही थीं। इस फल की उम्र महज एक दिन होती है। बाजार न मिलने पर महिलाएं मजबूरी में सस्ते में बेचतीं या फेंकना पड़ता। यहीं से सवाल उठा क्या अरावली के जंगलों में उगने वाले फल दुनिया तक नहीं पहुंच सकते हैं।
राजेश ने उदयपुर स्थित कृषि विश्वविद्यालय में प्राकृतिक फलों पर अध्ययन किया। शिक्षकों से प्रशिक्षण लिया और सीमित पूंजी के साथ काम शुरू किया। शुरुआत पांच गांवों से हुई। एक गांव में छोटी प्रोसेसिंग यूनिट लगी। काम बढ़ा, लेकिन चुनौती सामने आई सीताफल तो केवल सितंबर-अक्टूबर में मिलता है, फिर शेष दस महीनों में रोजगार कैसे बने?
यहीं से फोकस पूरी तरह अरावली पर आया। आमतौर पर अरावली को खनन के नजरिए से देखा जाता है, जबकि इसके जंगल औषधीय और ऑर्गेनिक फलों की अपार संपदा समेटे हैं।
राजेश ने अरावली में पाए जाने वाले जामुन, आंवला जैसे फलों पर काम बढ़ाया। जामुन के बीज, पाउडर, क्यूब, जैम और टी पाउच जैसे उत्पाद तैयार किए। औषधीय गुणों से भरपूर इन उत्पादों को पसंद किया जाने लगा और विदेशों से भी डिमांड बढ़ी। आज यह पहल 48 आदिवासी गांवों की करीब 5000 महिलाओं के लिए आजीविका का मजबूत आधार बन चुकी है। जंगलों से फल संग्रहण, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग तक महिलाएं सीधे जुड़ी हैं।
ऑर्गेनिक उत्पाद देश-विदेश के बाजारों तक पहुंच रहे हैं और प्रतिष्ठित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी पसंद किए जा रहे हैं। राजेश का सपना है कि अरावली के जंगलों के फल-फ्रूट पूरी दुनिया तक पहुंचे।
उनका मानना है कि जब हम विदेशों से फल आयात कर रहे हैं, तब हमारे जंगलों में उनसे कहीं बेहतर और औषधीय गुणों से भरपूर विकल्प मौजूद हैं। जरूरत है केवल विजन, अध्ययन और सही दिशा में प्रयास की। यह पहल अरावली संरक्षण के साथ आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भरता और सम्मान की राह दिखाती है।
Published on:
04 Jan 2026 03:08 pm
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