
दुर्भावना के परमाणु से हरियाली नष्ट
उदयपुर. jain samaj news दुर्भावना भरे परमाणु मानव में रही हुई सद्भावना रूपी हरियाली को नष्ट कर बंजर भूमि में परिवर्तित कर रहे हैं। पंचायत नोहरा पर हरियाली अमावस्या पर आयोजित धर्म सभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ( jain saint kamal muni ) ने गुरुवार को ये विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दुर्भावना अपने आप में अधर्म, पाप और पतन का कारण है, जिसका रास्ता मनुष्य को नरक की ओर ले जाता है। मुनि ने कहा कि दुर्भावना से अगले का नुकसान हो या नहीं, लेकिन स्वयं में रहे हुए सद्गुणों को नष्ट करके शांति प्रेम वात्सल्य के पवित्र झरने को यह सूखा देती है। उन्होंने कहा कि दुर्भावना का असर पशु-पक्षी, पेड़-पौधों सहित पूरे वातावरण में पड़ता है। मुनि ने कहा कि दुर्भावना के कीटाणु से आत्मा के सद्गुण नष्ट होते हैं और शरीर रोगों का शिकार बनता जाता है। ये कीटाणु परिवार की मुस्कान छीन लेते हैं। इससे मुक्ति दिलाने की क्षमता सरकार, विज्ञान और चिकित्सक किसी के पास नहीं है। तपस्वी घनश्याम मुनि की 17 उपवास रहा। कौशल मुनि ने मंगलाचरण किया।
मानव को मिला पशुओं का सौंदर्य
वासुपूज्य मंदिर स्थित दादाबाड़ी में नियमित प्रवचन में साध्वी अभ्युदया ने कहा कि मनुष्य को अलंकार पशुओं के समान दिए गए हैं। साहित्य में हमेशा अलंकार पशु-पक्षियों के समान होते हैं। सारा सौंदर्य पशुओं पर आधारित है। किसी पशु को मानव नहीं कहा गया या मानव के समान उसे अलंकृत नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि यशोदा और रुक्मिणी में यही फर्क है। कृष्ण सोए हुए हैं। रुक्मिणी बैठी हुई हैं। कृष्ण कहते हैं कि यशोदा होती तो दूध लेकर बैठती कि कब कन्हैया उठे और दूध पीए। रुक्मिणी सोचती है कि उठेंगे तब दूध ले आऊंगी। साध्वी ने कहा कि भजन से परमात्मा और भोजन से खुद की तृप्ति होती है। संधि के लोए श्रीकृष्ण गए तो सारा हस्तिनापुर उनको देखने उमड़ पड़ा। दुर्योधन ने खाने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने मना किया कि आज कहीं और का वादा है। विदुर के यहां भोजन करने पहुंचे। काकी उनको देखते ही बेसुध हो गई कि नारायण स्वयं उनके घर पर हैं।
क्रोध की गहराई से बचों
आयड़ स्थित ऋषभ भवन में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य ज्ञानचंद्र ने कहा कि पर्वतराजि के समान क्रोध करने वाला नरक में जाता है। सीमा पार क्रोध करने वाला खुद का भान भूल जाते हैं, क्रोध पल भर के लिए भी आया तो वह नरकगामी हो सकता है। क्रोध को जैन शास्त्रों में अनंतानुबंधी कहा गया है।
आत्म श्रेय को भी साध
आयड़ तीर्थ स्थित आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए साध्वी लक्षिता ने कहा कि संसार या युग अच्छा या बुरा नहीं होता। अच्छी या बुरी होती है दृष्टि। इसी दृष्टि को गहराई से अपने भीतर उतारें तो साफ हो जाता है कि जो भी अच्छा या बुरा है। खराबी खुद में खोजें और अपनी वृत्तियों में बदलाव लाएं। jain samaj news यह प्रयत्न अवश्य सफल होगा।
Published on:
02 Aug 2019 06:00 am
