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आरटीआई जनता हक! फिर भी सरकारी विभाग दे रहे जनता को गोलमाल जवाब

आरटीआई जनता हक! फिर भी सरकारी विभाग दे रहे जनता को गोलमाल जवाब

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RTI

मोहम्मद इलियास/उदयपुर
सरकारी विभागों में कामकाज को लेकर किसी तरह की पारदर्शिता नहीं है। यहीं कारण है कि यहां के विभागों से जब जनता सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत सूचना मांग रही है तो उन्हें सही जवाब नहीं मिल रहे। अधिकारी पहले तो उन्हें गोलमाल जवाब देकर टला देते है, जिस किसी को जानकारी देते है तो आधी अधूरी देते है। इसके अलावा जिस दस्तावेज की जानकारी देती है तो जनता उन्हें छिपा देती है।
सरकारी विभागों में आरटीआई के आवेदनों को ऐसे कई ढेर पड़े है। अपील पर अपील करने पर अधिकांश तो थक हार कर वापस पलट कर नहीं देखते है। ऐसे ही आरटीआई के ऐसे कई आवेदन है तो जिसमें परिवादियों को विभागों ने गलत-गलत जवाब दिया।
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केस-1
विभाग-अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड
मांगी जानकारी-कॉम्पलेक्स में एक दुकानदार ने लिया मीटर कनेक्शन, उसी जगह अन्य ूदुकानदारों ने उसी से कनेक्शन ले लिया। उपभोक्ता विभाग को सारी दुकाने उसके द्वारा संचालन बता रहे है। नियम की कॉपी मांगी।
गोलमाल जवाब- हमने एक कनेक्शन दे दिया अब उपभोक्ता की मर्जी। अगर ऐसा तो एक ही मीटर से सब को कनेक्शन मिलेगा और स्थाई शुल्क व अन्य सरचार्ज की चोरी होगी। राजस्व की हानि होगी।
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केस- 2
विभाग- राजस्थान आवासन मंडल
जानकारी- विभाग द्वारा विकसित व प्रस्तावित कॉलोनियों सभी प्रकार के मकानों के टाइप डिजाइन की प्रति
जवाब-52 तरह की टाइप डिजाइन है, प्रति पेज 590 रुपए मांगें गए। कुल 30680 रुपए की मांग की। जबकि नियम 2 रुपए प्रति पेज का है। आरटीआई में देने से भी मना कर दिया।
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केस-3
विभाग- जन स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग
जानकारी- आरयूआईडीपी व पीएचइडी के मध्य सीवरेज के दौरान क्षतिग्रस्त होने वाली पाइपलाइन के संबंध में अनुबंध की कॉपी, टूट फूट पर कौन सुधार करेगा।
जवाब- संबंधित विभाग ने आवेदन लेने से ही मना कर दिया। लोक सूचना अधिकारी होने के बाजवूद उच्चाधिकारियों के पास भेजते हए टालमटोल कर दी।
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केस-4
विभाग- मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी
जानकारी- खादी ग्रामोद्योग, ग्रामोद्योग विकास समिति और अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं से जो दवाइयों व उपकरण, अन्य कंजूमेबल सामग्री में एक वर्ष का ब्योरा मांगा।
जवाब- पोस्टल ऑर्डर पर विवरण नहीं लिखा इस कारण जानकारी नहीं दे सकते। जबकि राजस्थान सूचना आयोग ने एक आदेश में स्पष्ट कहा कि आवेदक ने पोस्टल ऑर्डर में कुछ नहीं लिखा है तो लोकसूचना अधिकारी अपने स्तर पर भर सकता है। सूचना से वंचित करने के लिए उसे घूमा दिया।
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केस-5
विभाग- जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय डूंंगरपुर
जानकारी- सडक़ दुर्घटना से संबंधित रोजनामचा, हस्तलिखित बयान व थाने में दुर्घटना के बाद खड़ी गाड़ी के पाट्र्स चोरी होने के संबंध में सूचना मांगी।
जवाब- रोजनामचे की कॉपी नहीं दी। अनुसंधान अधिकारी का ट्रांसफर होना बताकर टला दिया। गाड़ी थाने में खड़ी होने व उसके वहां से व्हील गायब होने के बावजूद चोरी की रिपोर्ट नहीं की और मालखाने के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होना बताया जबकि परिवादी को रिसविंग दी गई थी।
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केस-6
विभाग- वन विभाग
जानकारी मांगी- अभ्यारण्य में वन्यजीवों से खर्च संबंधी सूचना मांगी गई।
जवाब- एक माह में आवेदन को पोस्टल ऑर्डर नहीं भरना बताते हुए लौटा दिया। प्रथम अपील के बाद सूचना दी।
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केस-7
विभाग- प्रादेशिक परिवहन कार्यालय
जानकारी मांगी-आईसीयू ऑन व्हील एम्बुलेंस से संबंधित सूचना मांगी
जवाब- विभाग ने अब तक जानकारी नहीं दी। मामले में अपील की।
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केस-8
विभाग-नगर निगम
जानकारी मांगी- अलग-अलग समितियों के खर्च, पेचवर्क संबंधी, लाइसेंस संबंधी, कचरा निस्तारण व राजस्व संबंधी कई आवेदन किए गए।
जवाब- विभाग ने अब तक किसी को भी जवाब नहीं दिया। प्रथम अपील में गए वहां भी अब तक सुनवाई नहीं हो पाई। कुछ ने सूचना आयोग में अपील लगाई है।
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