
छात्रसंघ चुनाव विशेष : छात्र राजनीति की ‘पौध’, अब शह-मात के ‘महारथी’
भुवनेश पंड्या/ उदयपुर.छात्र राजनीति के वे चेहरे, जिन्हें आज हर कोई जानता है। चुनाव में इनकी रण-नीति बड़े बड़े के दांव फेल कर देती है। कोई चार बार विधायक रहा तो कोई सांसद। हर कार्यकर्ता इनसे राजनीति का सबब सीखने को लालायित रहता है। इन राजनेताओं के विद्यार्थी काल पर नजर डालें तो पता चलता है कि राजनीति का बीजारोपण तो इनकी किशोरावस्था में हो गया था, जो आज वट वृक्ष बनकर पल्लवित हो रहा है। कॉलेज या इसके आसपास का माहौल उनमें ऐसे राजनेता की जमीन तैयार कर चुका था, जिससे आज बड़ा राजनीतिक चेहरा बन कर उभरा है। ऐसे ही कुछ नेताओं पर यह खास रिपोर्ट :-
गुलाबचंद कटारिया: गृहमंत्री
- गृहमंत्री कटारिया ने 1973-74 में जब वकालात की पढ़ाई शुरू की तो वह विद्यार्थी परिषद से जुडकऱ छात्र नेताओं को टिकट आवंटन में भूमिका निभाने लगे थे। आपातकाल 1975-77 में वे प्रदेश में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेशाध्यक्ष बने। डीआईआर से जुडऩे के बाद वे जेल भी गए। कटारिया मानते हैं कि छात्र राजनीति में लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू होनी चाहिए ताकि चुनाव अनुशासित और सीमित दायरे में हों।
सीपी जोशी, कांग्रेस, पूर्व केन्द्रीय मंत्री
प्राथमिक स्कूल से लेकर स्नातकोत्तर तक चार बार प्रेसिडेंट बने। 1950 से 1960 के दशक में नाथद्वारा से स्कूलिंग के दौरान ही प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल में प्रेसिडेंट बन गए थे। उदयपुर एमएलएसयू में महाराणा भूपाल कॉलेज से बीएससी में सीआर बने थे। एमएससी करने के दौरान 1968-69 में वाइस प्रेसिडेंट व एमएससी फाइनल में 1969-70 में प्रेसिडेंंट बने। बाद में स्कूल ऑफ एमए साइकॉलोजी में पढ़ाई के दौरान वे सीधे चुनावों में 1974 में फिर से प्रेसिडेंट बन गए।
अर्जुनलाल मीणा, सांसद
भीलवाड़ा के माणिक्यलाल वर्मा राजकीय महाविद्यालय से एमकॉम करने के दौरान 1989 में जनजाति छात्र संगठन के जिलाध्यक्ष बने थे। इसी बीच, वह विद्यार्थी परिषद से भी जुड़ गए। आठवीं ऋषभदेव में पढ़े और हायर सैकण्डरी फतह स्कूल से। वहां भी राजनीतिक क्रिया-कलापों में उनकी महती भूमिका होती थी। 1992 में सांख्यिकी निरीक्षक बनने के बाद भी छात्र नेता उदयपुर बुलाकर राय लेते थे। शुरू से ही जनजाति छात्रों की लीडरशिप में खूब सक्रिय रहे।
सीपी जोशी, सांसद उदयपुर-चित्तौडगढ़़
छात्र काल से ही ग्रामीण राजनीति से सक्रिय रहे जोशी ने बताया कि पहली बार प्रथम वर्ष में ही 1993 में सीआर कक्षा प्रतिनिधि बने थे। द्वितीय वर्ष में महाराणा प्रताप कॉलेज चित्तौडगढ़़ के वाइस प्रेसिडेंट बने और वर्ष 1995 में वह पीजी महाविद्यालय के प्रेसिडेंट बन गए थे। मूलत: भादसौड़ा गांव के निवासी जोशी पहले ऐसे छात्र नेता था, जो स्नातक विद्यार्थी काल में स्नातकोत्तर कॉलेज के प्रेसिडेंट बने थे।
चन्द्रसिंह कोठारी: महापौर
महापौर कोठारी वर्ष 1978 में उदयपुर विवि में एबीवीपी के छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे। उनके चुनाव प्रचार के लिए वर्तमान के केन्द्रीय मंत्री विजय गोयल उदयपुर आए थे, जो तक दिल्ली विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष थे। मुखर्जी चौक में पहली बार भाषण दिया था, मंच बनाने के पैसे नहीं थे, तो एक दुकान को मंच बना दिया था। जीतने के बाद ट्रक के डाले में बैठकर जुलूस निकाला था। उनके पास साइकिल भी नहीं थी, संगठन ने उन्हें मोटरसाइकिल गिफ्ट की गई थी।
फूलसिंह मीणा: विधायक उदयपुर ग्रामीण
ये कभी कॉलेज नहीं गए, लेकिन राजनीति का बीज स्कूल में डल गया। वह 72 में अपने स्कूल के प्रेसिडेंट बने थे, हालांकि इसके बाद परिस्थितियों के कारण आगे पढ़ नहीं सके, लेकिन पहली से सातवीं तक वह छात्र राजनीति में सक्रिय थे। 1965 से 72 तक हर कक्षा में बतौर मॉनिटर रहकर काम किया। बकौल मीणा वह संघ के स्वयंसेवक थे। सातवीं पास कर खेती करने लग गए थे। आज के दौर में छात्रसंघ चुनावों में जो पैसा खर्च होता है, वह गलत है।
रणधीर सिंह भींडर: विधायक वल्लभनगर
भींडर ने बताया कि वे कॉलेज करने के दौरान चुनाव जरूर लड़े, लेकिन किसी पार्टी से जुड़े नहीं थे। वर्ष 1978 में विवि में एमपी के चुनाव होते थे, उस समय चार लोगों को लेते थे। वह आरसीए कॉलेज से कृषि में बीएससी कर रहे थे। चुनावों में वह एक वोट से हार गए थे। तब वर्तमान में राजसमंद के सांसद हरिओम सिंह राठौड़ विवि के प्रेसिडेंट बने थे। उस समय उदयपुर विवि नाम था।
Published on:
23 Aug 2018 06:17 pm
