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राजस्थान में BJP नेत्री वायरल वीडियो कांड से जुड़ी बड़ी खबर, मामले से जुड़े लोगों की मुश्किलें बढ़ी

उदयपुर में भाजपा नेत्री के कथित वीडियो, ब्लैकमेलिंग और दुष्कर्म प्रकरण में 22 दिन बाद बड़ा बदलाव हुआ है। डीएसपी गोपाल चंदेल से जांच हटाकर एएसपी मुख्यालय गोपाल स्वरूप मेवाड़ा को सौंपी गई है। डीजीपी स्तर के आदेश के बाद निष्पक्ष जांच के संकेत माने जा रहे हैं।
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उदयपुर

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Arvind Rao

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Updated: 5 Mar 2026, 9:22 AM IST

Rajasthan BJP Leader Leaked Video Scandal

Rajasthan BJP Leader Leaked Video Scandal (Photo-AI)

Udaipur BJP Leader Video Row: भाजपा नेत्री के कथित वीडियो, ब्लैकमेलिंग और बलात्कार से जुड़े चर्चित मामले में 22 दिन बाद बड़ा प्रशासनिक बदलाव हुआ है। अब तक जांच कर रहे डीएसपी गोपाल चंदेल से प्रकरण हटाकर एएसपी मुख्यालय गोपाल स्वरूप मेवाड़ा को सौंप दिया गया है। यह आदेश डीजीपी स्तर से जारी हुआ है, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पुलिस मुख्यालय ने मामले को गंभीरता से लिया है।

पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवालों का जवाब देना विभाग के लिए आसान नहीं रहा। इसी पृष्ठभूमि में अब जांच अधिकारी बदले जाने को अहम माना जा रहा है। एएसपी मुख्यालय को जांच सौंपने से यह संदेश गया है कि राज्य स्तर पर मामले की निगरानी की जा रही है।

जानकारों का मानना है कि जांच में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। ऐसे में मामले को दबा देने की आशंकाओं पर विराम लग गया है। वहीं, केस में उलझ रहे लोगों की धड़कनें बढ़ गई हैं।

शुरुआत से ही उठ रहे थे सवाल

मामला दर्ज होने के बाद से ही जांच की निष्पक्षता और प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे थे। खासतौर पर यह मुद्दा प्रमुख रहा कि रिपोर्ट भूपालपुरा थाने में दर्ज होने के बावजूद जांच डीएसपी गोपाल चंदेल को क्यों सौंपी गई, जबकि वह उनके अधिकार क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से नहीं आता था। इस बिंदु पर राजस्थान पत्रिका ने भी सवाल उठाए थे।

प्रकरण में उस समय और विवाद खड़ा हो गया, जब रात तीन बजे आरोपी को पकड़ने की कार्रवाई को लेकर प्रकाशित खबरों पर डीएसपी ने आपत्ति जताई थी। हालांकि, बाद में सामने आए सीसीटीवी फुटेज ने स्थिति स्पष्ट कर दी। फुटेज के अनुसार, डीएसपी गोपाल चंदेल और एक भाजपा नेता आरोपी को पकड़ने मौके पर पहुंचे थे।

प्रकरण दबाना हुआ मुश्किल

केस से जुड़े इस बदलाव को राजनीतिक गलियारों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक पक्ष पहले ही मामले में निष्पक्ष जांच की मांग उठा चुका है। ऐसे में जांच अधिकारी बदलने से यह संकेत मिलता है कि सरकार प्रकरण को दबाने के बजाय तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहती है। ऐसे में संबंधित लोगों की मुश्किलें बढ़ना तय है।