
राष्ट्रीय मंच तक चमक रहे खेलगांव से निकले खिलाड़ी (फोटो- पत्रिका)
उदयपुर: मिट्टी के मैदान, टूटी-फूटी गेंद और सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े जनजाति बहुल इलाकों व शहर की गलियों से निकले बच्चे अब खेलगांव की सुविधाओं की बदौलत खेल जगत में नई पहचान बना रहे हैं। थोड़ी सी सुविधा और गुरुज्ञान ने उनकी लगातार प्रतिभा निखर रही है। आज यही खिलाड़ी तीरंदाजी, तैराकी, हॉकी, क्रिकेट, बास्केटबॉल, स्केटिंग, जूडो और मुक्केबाजी में अपनी चमक बिखेर रहे हैं।
साल 2014 में तैराकी से शुरू हुआ खेलगांव मात्र एक दशक में जनजाति बहुल इलाके से लेकर शहर के कई खिलाड़ियों को तैयार कर चुका है। यहां से निकले खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद जैसे महान खिलाडिय़ों के पदचिह्नों पर चलते हुए अपनी मेहनत और लगन से नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। राष्ट्रीय खेल दिवस 29 अगस्त के मौके पर खेलगांव व शहर के खिलाडिय़ों को लेकर पेश है विस्तृत रिपोर्ट…
उदयपुर का युग चैलानी जूनियर से सीनियर तक सभी श्रेणियों में पदक जीत चुका है। खेलो इंडिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी उसने अपनी छाप छोड़ी है। वहीं, विधि सनाढ्य ने राजस्थान चैंपियनशिप जीतकर कई रिकॉर्ड बनाए हैं।
झाड़ोल के चतरलाल बढ़ेरा और परसाद के दीना कलासुआ राष्ट्रीय स्तर पर तीरंदाजी प्रतियोगिताओं में भाग लेकर नाम कमा चुके हैं। चतरलाल तो अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज लिबाराम का भानजा भी है।
डूंगरपुर के दिलीप खोखर और सिरोही के दादियाराम खलिहान में मिट्टी पर अभ्यास करते हुए राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुके हैं। इन खिलाड़ी के साथ ही खेलगांव में कई और भी हॉकी खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं। जो नियमित अभ्यास कर रहे हैं।
आत्मरक्षा के गुर सीखने के लिए अब बेटियां भी बॉक्सिंग और जूडो सीख रही हैं। पानेरियों की मादड़ी निवासी ताश्री मेनारिया नेशनल में दो गोल्ड जीत चुकी हैं। आमिल अली मुक्केबाजी में पांच पदक दिला चुके हैं।
लॉन टेनिस में उदयपुर के हर्षिल मेवाड़ा और याति जैन कई पदक जीतने के बाद इंडिया रैंकिंग के लिए खेल रहे हैं। बास्केटबॉल में अंशिका यादव, धनंजय शक्तावत, जाह्नवी नेशनल में खेल चुके। धनंजय बेस्ट प्लेयर भी घोषित हो चुके हैं।
खेलगांव के अतिरिक्त क्रिकेट में भी बेटियां आगे निकल रही हैं। खेरवाड़ा की सोनल कलाल और उदयपुर की ऋतु लोढ़ा, रीजा शेख बेटिंग में चौके छक्के मार रही हैं। ये महिला खिलाड़ी इंडिया चैलेंजर क्रिकेट तक खेल चुकी हैं।
उदयपुर के परसाद गांव की दीना कलासुआ बचपन से ही संघर्षों से लड़ती आई। पिता नारायण लाल का साया जल्दी उठ गया और मां के साथ खेतों में हाथ बंटाना पड़ा। खेतों में पक्षियों को उड़ाने के लिए लकड़ी के तीर-कमान से साधा निशाना उसके जीवन का पहला अभ्यास बना। अभाव और कठिनाइयों में भी उसने पढ़ाई जारी रखी।
चार भाई-बहनों में मंझली दीना बाद में उदयपुर आ गई और मधुबन छात्रावास में रहना शुरू किया। यहीं से तीरंदाजी में उसकी शुरुआत हुई। खेलगांव में अभ्यास के बाद जयपुर अकादमी से विशेष प्रशिक्षण मिला और फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब तक वह दो बार नेशनल में उदयपुर का प्रतिनिधित्व कर पदक जीत चुकी हैं। अब दीना का लक्ष्य आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश का नाम रोशन करना है।
डूंगरपुर के बिछीवाड़ा क्षेत्र के चूंडाड़ा गांव के महेन्द्र भानात की हॉकी यात्रा भी कम प्रेरक नहीं है। गरीबी की परिस्थितियों में पले-बढ़े महेन्द्र को बचपन से ही खेल का शौक था। गांव के मैदान में टूटी-फूटी गेंदों से साथियों के साथ खेलते हुए उसने पहली बार हॉकी खेली। स्कूल में पीटीआई को बच्चों को हॉकी सिखाते देखा तो शौक और बढ़ गया।
गांव में जो सीखा, उसे आगे बढ़ाने का मौका तब मिला, जब उदयपुर खेलगांव में उसे हॉकी टीम ने चुना। गांव की मिट्टी पर खेलने का अभ्यास उसे टर्फ ग्राउंड में शुरुआत में भारी पड़ा। कई बार गिरा, पर हार नहीं मानी। मेहनत के बूते अब वह राष्ट्रीय स्तर तक खेल चुका है और लगातार निखर रहा है।
उदयपुर संभाग के डूंगरपुर जिले के बॉडीगामा गांव का प्रणय सेठ पैरा बैडमिंटन का बड़ा नाम बन चुके हैं। जन्मजात एक पैर छोटा होने के बावजूद कभी हार नहीं मानी। आर्टिफिशल पैर लगने के बाद जुनून और लगन बढ़ी। स्कूल के दिनों में जब पहली बार बैडमिंटन प्रतियोगिता में भाग लिया तो खेल से गहरा लगाव हो गया, फिर इसे आगे बढ़ाया।
कठिन अभ्यास और आत्मविश्वास के दम पर प्रणय आज भारत ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना चुके हैं। इजिप्ट में इंटरनेशनल डबल्स में रजत और जापान में कांस्य पदक जीता। आज प्रणय बेंगलुरु में अभ्यास कर रहे हैं। क्योस्क फाउंडेशन उसकी पूरी जिमेदारी उठाकरअंतरराष्ट्रीय स्तर पर और आगे बढ़ाने में मदद कर रहा है। प्रणय उन सभी खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरणा हैं, जो हालातों से हार मान लेते हैं।
खेल दिवस पर मेजर ध्यानचंद को याद करते हुए खेलगांव के बच्चों ने संदेश दिया कि खेल सिर्फ पदक जीतने का साधन नहीं, बल्कि अनुशासन, स्वास्थ्य और जीवन संवारने का माध्यम हैं। जनजाति बहुल इलाके से लेकर शहर के कई खिलाड़ी विभिन्न खेलों में निखर रहे है। राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद और जिला प्रशासन खिलाड़ियों के लिए हर सुविधाएं मुहैया करवा रही है।
-महेश पालीवाल, जिला खेल अधिकारी
Updated on:
29 Aug 2025 01:16 pm
Published on:
29 Aug 2025 01:16 pm
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