
उदयपुर की इस फुलवारी से लुप्त हुई मूल्यवान औषधियां!
उदयपुर/ फलासिया. पंचायत समिति के पानरवा में वन्यजीव अभयारण्य स्थित फुलवारी की नाल से आयुर्वेद में विशेष महत्व रखने वाली बहुमूल्य औषधियां लगभग गायब होती जा रही हैं। अज्ञानता और व्यवसायीकरण के बीच इन औषधियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इतना ही नहीं आयुर्वेद की जानकारी रखने वाले क्षेत्र बूढ़े-बुजुर्गों की घटती संख्या भी इन औषधियों के पतन के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार बनी हुई हैं। ऐसे में फुलवारी क्षेत्र को सरकारी संरक्षण देने की आवश्यकताएं भी जोर देने लगी हैं। गौरतलब है कि नाल क्षेत्र में पूर्व में कभी जंगली सफेद मूसली, ब्राह्मी, नीर ब्राह्मी, सालम मिश्री, वायहाकल जैसी औषधियां आसानी से उपलब्ध हो जाती थी, जो कि अब ढूंढने से भी बमुश्किल मिलती हैं।
इन बीमारियों में उपयोग
सफेद मूसली - यह औषधि मानव में उर्जा व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, वजन बढ़ाने, कुपोषण से बचाने, जोड़ो के दर्द में राहत सहित गर्भवती महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
ब्राह्मी व नीर ब्राह्मी - ब्राह्मी व नीर ब्राह्मी का उपयोग मंदबुद्धि रोगियों के लिए होता था। आयुर्वेद में इस जड़ी-बूटी का उपयोग टोनिक के तौर पर भी होता है।
सालम मिश्री- सालम मिश्री को स्थानीय भाषा में कुकडिय़ा भी कहते हैं। जमीन के भीतर पैदा हाने से भी इसका आयुर्वेदिक महत्व बढ़ जाता है। शारीरिक कमजोरी को दूर करने के लिए भी इसका उपयोग होता है। पुरुषों के लिए शक्तिवद्र्धक टोनिक भी है।
वायहाकल - महुए के पेड़ पर होने वाला वायहाकल लकड़ीनुमा होता है। इसका उपयोग गठिया, वाई, वाद जैसी बीमारियों में होता है।
कारण जो सामने आए
भौगोलिक वातावरण में बदलाव के अलावा व्यवसायीकरण के चलते लोग जंगल में स्वत: होने वाली जड़ी-बूटियों को जड़ से उखाड़ लेते हैं। ऐसे में हवा के साथ फैलने वाले उनके बीच नई पौध को जन्म नहीं दे पाते। स्थानीय परंपरा के तहत जंगलों में आग लगाने की वजह से भी ये औषधियां अक्सर खत्म हो जाती हैं।
रि-जेनरेशन के प्रयास
यह सही है कि जंगलों से वन औषधियां लुप्त हो रही हैं। उच्चाधिकारियों से बातचीत कर इन पौधों को रि-जेनरेशन का प्रयास करेंगे।
लाल सिंह सिसोदिया, क्षेत्रीय वन संरक्षक, फुलवारी की नाल, पानरवा
Published on:
25 Jun 2019 06:00 am
